
- सॉफ्टवेयर इंजीनियर से लेकर फैशन की छात्रा तक, छुट्टी के दिन नो-प्रॉफिट पर बांट रहे हैं विवेकानंद से लेकर भगत सिंह तक के विचार
लियाकत मंसूरी
नित्य संदेश, मेरठ। दीपावली के शोर और बाजार की चकाचौंध के बीच राजकीय इंटर कॉलेज के मैदान में चल रहे मंडलीय खादी ग्रामोद्योग प्रदर्शनी-महोत्सव में एक छोटा सा बुक स्टॉल बड़ी लकीर खींच रहा है। नाम है – ‘नया जीवन बुक स्टॉल’। न यहां लाउडस्पीकर है, न भीड़ बुलाने के लिए कोई ऑफर, फिर भी यहां युवाओं का तांता लगा है। कारण है इस स्टॉल को चलाने वाले मेरठ के 5 युवा, जिन्होंने नौकरी और पढ़ाई के साथ-साथ युवाओं को खुद से मिलाने की जिम्मेदारी उठा ली है।
इस पहल के सूत्रधार हैं माधवपुरम निवासी प्रशांत तायल। पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर, लेखन के शौकीन और ‘जानिए फिर मानिये’ पुस्तक के लेखक प्रशांत खुद कवि भी हैं। उनका कहना है, “आज का युवा अपने आप को नहीं समझ पा रहा है। वह परेशान है, गलत उम्मीदों में उलझा है। सोशल मीडिया, करियर, रिश्तों के बीच वह भटक गया है। मेरा उद्देश्य है कि वह गहराई से समझे, खुद की ओर वापस लौटे और अपना व्यर्थ समय बचा ले।” इसी सोच के साथ उन्होंने अपने जैसे 4 और साथियों को जोड़ा। धीरे-धीरे ये 5 लोगों की एक टोली बन गई, जो हर छुट्टी वाले दिन शहर में कहीं न कहीं किताबों का स्टॉल लगाती है।
कौन हैं ये 5 युवा?
प्रशांत तायल निवासी माधवपुरम, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, लेखक और कवि। पूरी पहल के संयोजक। रोहित – एक अकाउंट कंपनी में कार्यरत। हिसाब-किताब की नौकरी के बीच जीवन का हिसाब समझा रहे हैं। कनिका गुप्ता – प्राइवेट कंपनी में जॉब करती हैं। खास तौर पर युवतियों को आत्मनिर्भर और वैचारिक रूप से मजबूत बनाने के लिए जुड़ीं। अनामिका – विद्या कॉलेज से फैशन डिजाइनिंग की छात्रा। फैशन की दुनिया से निकलकर विचारों की दुनिया की ओर युवाओं को मोड़ रही हैं। अनुज – मेरठ कॉलेज का छात्र। कैंपस में अपने साथियों के बीच इस मुहिम का सबसे सक्रिय चेहरा।
क्या है स्टॉल पर खास?
स्टॉल पर कोई उपन्यास या फिल्मी कहानियां नहीं, बल्कि वे किताबें हैं जो सोचने पर मजबूर करती हैं। यहां आचार्य प्रशांत, स्वामी विवेकानंद, ओशो, जे. कृष्णमूर्ति, शहीद भगत सिंह, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महापुरुषों की वैचारिक पुस्तकें रखी गई हैं। प्रशांत बताते हैं, “हम कोई दुकानदार नहीं हैं। हम किताबें बेचने नहीं, बांटने निकले हैं। इसलिए हम इन्हें नो-प्रॉफिट पर देते हैं। कई बार जो छात्र सच में पढ़ना चाहते हैं लेकिन पैसे नहीं हैं, उन्हें हम निशुल्क भी दे देते हैं।”
खादी मेले में क्यों?
उत्तर प्रदेश ग्रामोद्योग बोर्ड द्वारा आयोजित यह खादी मेला वैसे तो खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों के लिए जाना जाता है, लेकिन इस बार आयोजकों ने युवाओं के लिए वैचारिक स्टॉल को भी जगह दी है। मेले में आने वाले बुजुर्ग जहां खादी खरीद रहे हैं, वहीं उनके बच्चे और युवा इस बुक स्टॉल पर घंटों रुक रहे हैं, किताबें पलट रहे हैं, सवाल पूछ रहे हैं। यह छोटी सी पहल बता रही है कि मेरठ का युवा सिर्फ रील्स और शोर में नहीं, बल्कि गहरे सवालों में भी रुचि रखता है, बस उसे सही किताब तक पहुंचाने वाला कोई चाहिए।


