
प्रोफेसर (डॉ.) गिरीश चंद्र त्रिपाठी
नित्य संदेश। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रमुख प्राथमिकताओं में सामाजिक समरसता की अवधारणा को जमीनी स्तर पर क्रियान्वित कर रहा है। अपने सतत्,व्यापक और कर्मठ प्रयासों के माध्यम से संघ ने अपनी शताब्दी यात्रा पूर्ण की है। इस दीर्घ यात्रा के दौरान संघ ने सेवा, समर्पण और सामाजिक जागरण की भावना को व्यापक स्तर प्रसारित करने का प्रयास किया है। व्यक्ति- निर्माण एवं राष्ट्र- निर्माण के क्षेत्र में उसके कार्यों की उपादेयता विभिन्न सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से परिलक्षित होती है। संघ स्वयं को “एक समर्थ, संगठित और समरस भारत के निर्माण के लिए समर्पित संगठन के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।”
संघ की दृष्टि में वह मात्र संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्र- जीवन में सामाजिक चेतना के प्रसार का एक अभियान है। सामाजिक समरसता के माध्यम से जातिगत -भेदभाव, उच्च- नीच के भावना तथा सामाजिक विषमता से उत्पन्न मानसिक अवरोधों को दूर करना उसके प्रमुख उद्देश्यों में शामिल रहा है। इस दिशा में संघ हिंदू समाज की एकता ,सामाजिक सहभागिता और पारस्परिक सद्भाव को मजबूत करने पर बल दे रहा है। समरस समाज की स्थापना का यह प्रयास सामाजिक विभेदों को कम करने तथा राष्ट्रीय एकात्मकता की भावना को व्यापक बनाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में समरसता का आशय समाज के सभी वर्गों , जातियों ,पंथों एवं परंपराओं के प्रति सम्मान ,प्रेम, सौहार्द, सद्भाव और आत्मीयता की भावना से है । यह विचारधारा सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर समान, सह -अस्तित्व और पारस्परिक सहयोग को प्रोत्साहित करती है। समरसता का मूल दर्शन “विविधताओं को स्वीकार करते हुए समाज में एकात्मकता स्थापित करना था।” संपूर्ण सृष्टि को परस्पर संबंध मानकर “एक सूत्र में पिरोना है।” वस्तुतः “समरसता भारतीय संस्कृति की वह जीवन दृष्टि है, जो सामाजिक एकता, मानवीय गरिमा और सामूहिक उत्तरदायित्व के माध्यम से एक सशक्त, समतामूलक एवं सौहार्दपूर्ण समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करती है।”
समसामयिक परिप्रेक्ष्य में संघ का मूल उद्देश्य समाज को संगठित कर राष्ट्र को सशक्त बनाना है। इस दृष्टि से सामाजिक समरसता की स्थापना के लिए संघ द्वारा किए जा रहे प्रयासों का महत्व एवं प्रासंगिकता निरंतर बढ़ रही है। भारत वैश्विक नेतृत्व की दिशा में अग्रसर है, तब जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर विद्यमान सामाजिक विभाजनों को दूर करना तथा परस्पर सहयोग, समानता और आत्मीयता की भावना को उन्नयन करना आवश्यक है। सामाजिक समरसता के प्रति संघ का दृष्टिकोण जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर समाज की एकात्मकता, पारस्परिक सद्भाव और सामूहिक सामर्थ्य को विकसित करने पर केंद्रित है । वस्तुतः सामाजिक एकता और समरसता ही “सशक्त, समावेशी एवं आत्मनिर्भर राष्ट्र के निर्माण का आधार है।”
संघ के अधिकारी एवं स्वयंसेवक समर्पण ,अनुशासन एवं संरचनात्मक प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहे हैं। संघ का उद्देश्य समाज के पुनर्गठन, राष्ट्रीय एकात्मकता और सामाजिक चेतना में दीर्घकालिक योगदान देना है। संघ की स्थापना के प्रारंभिक दौर में राष्ट्रीय स्वतंत्रता की भावना एवं देश को औपनिवेशिक शासन से मुक्त करने की आकांक्षा का भी महत्वपूर्ण स्थान था । स्वयंसेवक राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित होकर भारत को परम वैभव के शिखर पर प्रतिष्ठित करने के संकल्प के साथ कार्य कर रहे हैं। संगठन का प्रमुख उद्देश्य समाज में एकता, समरसता और परस्पर आत्मीयता की भावना को उन्नयन करना है। इसके साथ ही संगठनात्मक अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा,निष्ठा और समर्पण जैसे मूल्यों के विकास के माध्यम से राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की भावना जाग्रत करना भी संघ के कार्य पद्धति का महत्वपूर्ण पक्ष है।
भारत भगवान श्री रामजी,भगवान श्री कृष्णजी एवं सम्राट अशोक जैसे महान विभूतियों के पुण्य भूमि है, जिसकी सांस्कृतिक परंपरा, समरसता , सहिष्णुता, और लोककल्याण के आदर्शों से समृद्ध रही है। संघ जातिगत भेदभाव और उच्च- नीच की भावना का विरोध करते हुए सामाजिक एकता एवं समरसता पर जोर देता है। जाति – पाती , भाषा और प्रांतीयता के आधार पर उत्पन्न विभाजन समाज की एकात्मकता को कमजोर करते हैं तथा राष्ट्र की सामूहिक शक्ति को क्षीण करते हैं। जाति के नाम पर किया जाने वाला दुर्व्यवहार और भेदभाव हिंदू समाज की एकात्मकता एवं सामर्थ्य के लिए बाधक है ।
अतः जातिगत संकीर्णताओं और वर्गगत भेदभाव से ऊपर उठकर परस्पर सम्मान, सहयोग और बंधुत्व की भावना को उन्नयन करना आवश्यक है ताकि एक सशक्त, समावेशी और आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण हों सके ,जब नागरिक राष्ट्र के प्रति अपनी निष्ठा,कर्त्तव्यपालन , सनातन सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण, भारतीय आदर्शों के संवर्धन, राष्ट्रभक्ति तथा सामाजिक समरसता एवं सद्भावना के व्यवहार में अभिव्यक्त करें। यही भाव राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने और भारत को प्रगतिशील एवं सशक्त राष्ट्र बनाने का आधार है।
संघ की व्यावहारिक उपादेयता, सामयिक प्रासंगिकता एवं सामाजिक योगदान के कारण निरंतर वृहद सफलता की दिशा में अग्रसर है। अनेक चुनौतियां एवं कठिनाइयों का सामना करते हुए संगठन ने समाधान क्षमता एवं अनुकूलशीलता का प्रदर्शन किया है। संघ का मौलिक लक्ष्य “समरस भारत के निर्माण की परिकल्पना पर केंद्रित है।” एक ऐसा भारत जो जातिगत विभाजन तथा संकीर्ण विचारधाराओं से ऊपर उठकर समावेशी एवं सभी को समान अवसर प्रदान करने में सक्षम हों। भारत में भूकंप ,बाढ़, चक्रवात एवं महामारी जैसी आपदाओं के दौरान संघ के स्वयंसेवकों ने निः स्वार्थ सेवा और समर्पण का उल्लेखनीय योगदान दिया है। समाजसेवा , दुर्बल वर्गों के सशक्तिकरण एवं सांस्कृतिक मूल्यों के संवर्धन के माध्यम से संघ राष्ट्र की प्रगति ,परम वैभवशाली, सर्वशक्तिमान एवं वैश्विक गुरु के तौर पर स्थापित कर रहा हैं।
संघ ने सामाजिक समरसता को बढ़ाने में बहुत अधिक काम किया है। सामाजिक समरसता में संघ ने जाति एवं भेदभाव से ऊपर उठकर समाज की एकात्मकता पर जोर दिया है। संघ के पंचम सरसंचालक पूजनीय के.सी सुदर्शन जी ने हिंदू समाज की कुरीतियों को समाप्त करने में अग्रणी भूमिका निभाई थे। वह सामाजिक कुरीतियों को विकास और सशक्त समाज के निर्माण में बाधक मानते थे। संघ ने समय-समय पर व्याख्यान, कार्यशालाएं एवं सामाजिक समरसता को लेकर जन जागरूकता एवं सेवा कार्यों को लेकर सामाजिक एकता और सहयोग को प्रोत्साहित किया है।
समसामयिक परिप्रेक्ष्य में सामाजिक समरसता, जातिवाद, उच्च -नीच, एवं सामाजिक विभेदों को समाप्त कर समान अधिकार ,सम्मान और अवसर सुनिश्चित करने में सहायक है। संघ के ‘पंच परिवर्तन ‘ ‘रक्षाबंधन ‘ ‘समरसता भोज ‘जैसे कार्यक्रम बंधुत्व ,सद्भाव और राष्ट्रीय एकात्मकता को मजबूती प्रदान करते हैं । सेवा, करुणा ,ममता एवं समर्पण के भाव से संघ मातृभूमि के प्रति निष्ठा और राष्ट्र भावना के उन्नयन हेतु निरंतर प्रयासरत हैं।
प्रोफेसर (डॉ.) गिरीश चंद्र त्रिपाठी
पूर्व कुलपति एवं चिंतक, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।










