
शब्द थक गए थे पुकारते-पुकारते,
अर्थ खो गए थे सारे।
तब तुम्हारे मौन ने आकर,
मुझे मुझसे ही उबार लिया।
मैं शोर से भरी थी,
तुम शून्य लेकर आए।
मैं भीड़ से घिरी थी,
तुम एकांत बन कर आए।
तुमने कुछ कहा नहीं,
बस देखते रहे।
और उसी देखने में,
मेरे सारे जन्म सँवर गए।
मैं बूँद थी जो सागर को ढूँढ रही थी,
तुमने बताया – बूँद में ही सागर है।
मैं बाहर भटक रही थी,
तुम भीतर बैठे मुस्कुरा रहे थे।
अब कुछ नहीं चाहिए प्रभु,
न ज्ञान, न मुक्ति, न वरदान।
बस तुम्हारा ये मौन,
और इसमें मेरा विलीन हो जाना।

माधुरी कनल


