
लेखक: शांता पारेख
बारिश कम क्या हो गई, दुनिया भर के मैसेज आने लगे—रिक्वेस्ट वाले, यह करो, वह करो! भाई, ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’। अच्छा होता कोई क्या कर रहा है, उसका वीडियो डालते। खुद कुछ करना नहीं, बस आगे सरकाना; अखबार और यूट्यूब इससे पटे पड़े हैं।
मैं उदयपुर वाली हूँ। मेरी शादी के बाद ऐसा अकाल पड़ा कि पिछोला झील सूख गई, जिसमें लैंब्रेटा स्कूटर चलने लगे। हां-हां, वही पिछोला जिसमें आज ‘डेस्टिनेशन मैरिज’ की धूम मची है! मेरा घर तीसरी मंजिल पर था, जिसमें एक चौकोर बालकनी अंदर चौक जैसी थी, जहाँ सारे कपड़े सुखाए जाते थे। उस पर लोहे की घिरनी (घिर्री) लगी थी, जिससे सारा सामान लटकाया जाता और ऊपर कुएँ की तरह खींचा जाता था—दूध, सब्जी, शक्कर, सौदा कुछ भी।
वह घिरनी उस अकाल में पानी खींचने के काम आई। बहुत कम समय के लिए नल आते थे और नीचे जाकर अति-अल्प पानी मिलता था। उसी पानी में कपड़े धोते और सारा निचोड़ा हुआ पानी उस ज़माने के बड़े पीतल के हंडे (जिसे ‘बेवड़ा’ कहते हैं, जो हर स्त्री को दहेज में दिया जाता है) में भरा जाता था। शुद्ध पानी बाल्टी से ऊपर खींचा जाता और घर की हर तपेली, गिलास, लोटा यहाँ तक कि कड़ाही तक भर दी जाती थी। हर व्यक्ति मंजन करने के लिए एक कटोरी पानी उठाता, वह भी इस्तेमाल के बाद एक लोहे की बाल्टी में इकट्ठा होता जो तीसरी मंजिल के फ्लश में उपयोग किया जाता था।
सबको बाथरूम में बड़ी परात में पटिए पर बैठकर नहाना पड़ता था, वह भी अति-अल्प पानी में। फिर वह इस्तेमाल किया हुआ पानी खुद बाल्टी में भरकर टॉयलेट के बाहर रखना होता था। बर्तन तगारी में मांजे जाते और वह पानी भी फ्लश में उपयोग होता। किचन से सब्जी, दाल, चावल धोने का निकला पानी तीसरी मंजिल पर लगे सुंदर गमलों और बेलों में डाला जाता था। पूरा पानी पिताजी ऊपर खींचते और हम सब उसे ‘घी’ की तरह नाप-तौलकर इस्तेमाल करते थे।
पानी का क्या मोल है, यह राजस्थान वालों से ज्यादा किसी को नहीं पता हो सकता, या फिर कच्छ वाले जानते हैं। मालवा तो सदा से “पग-पग रोटी, डग-डग नीर” रहा है। जयशंकर प्रसाद की ‘डाची’ कहानी पढ़ो, तो पानी का असली मोल समझ आएगा।
बातों से कुछ नहीं होता। ‘बटन दबाओ और मोटर चलाओ’ की संस्कृति ने केवल अपव्यय करना सिखाया है। फिर यह बेतरतीब विकास, जिसमें पेड़ों की बलि दी जा रही है और ग्लोबल वार्मिंग हो रही है—जिसे अशोक चक्रधर जी ‘धरती का बुखार’ कहते हैं। यह सब हमने ही बोया है और हम ही काटेंगे, पर सुधरेंगे नहीं! सम्मिट (सम्मेलन) होते रहेंगे, पर्यावरणवादी बोलते रहेंगे, पर हम किसी की नहीं सुनेंगे। बस भाषण देंगे, खुद कुछ भी नहीं करेंगे; क्योंकि ‘भगत सिंह पैदा तो हों, पर पड़ोसी के घर!’ शेखीबाज़

शांता पारेख
संपर्क: 9425311944


