
डॉक्टर संतोष झा
नित्य संदेश। भगिनी निवेदिता कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ब्राजील, लैटिन अमेरिका और दुनिया भर के लोगों के लिए लूला दा सिल्वा की जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक मूल्यों और जनकल्याणकारी राजनीति के प्रति जनता के भरोसे का महत्त्वपूर्ण संकेत है।
80 वर्षीय वामपंथी नेता लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने 25 अक्टूबर को हुए राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे चरण में दक्षिणपंथी प्रत्याशी फ्लेवियो बोलसोनारो को पराजित कर चौथी बार राष्ट्रपति बनने का गौरव हासिल किया। लूला को 51.79 प्रतिशत, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी को 48.21 प्रतिशत वैध मत मिले। पहले चरण में पिछड़ने के बाद उनकी वापसी ने इस जीत को और भी उल्लेखनीय बना दिया।
इस चुनाव का महत्त्व ब्राजील की सीमाओं तक सीमित नहीं है। इसके परिणाम लैटिन अमेरिका की राजनीतिक दिशा, वैश्विक शक्ति संतुलन, ब्रिक्स की भूमिका और भारत की विदेश नीति के संदर्भ में भी महत्त्वपूर्ण हैं। ऐसे समय में जब दुनिया व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, भू-राजनीतिक तनाव और वैचारिक ध्रुवीकरण से गुजर रही है, लूला की जीत बहुपक्षीय सहयोग और विकासशील देशों की सामूहिक आवाज के लिए नए अवसर पैदा करती है।
लूला का राजनीतिक जीवन श्रमिक आंदोलनों और सामाजिक न्याय के संघर्ष से जुड़ा रहा है। मजदूर नेता के रूप में उभरे लूला ने गरीबों, श्रमिकों और वंचित समुदायों के कल्याण को अपनी राजनीति का आधार बनाया। आर्थिक असमानता कम करना, सामाजिक सुरक्षा का विस्तार और कल्याणकारी राज्य को मजबूत करना उनकी प्रमुख प्राथमिकताएं रही हैं। उनकी वापसी आर्थिक विकास के साथ सामाजिक न्याय और समान अवसरों के महत्त्व को रेखांकित करती है। हालांकि, फ्लेवियो बोलसोनारो को मिले लगभग आधे मत ब्राजील में गहरे राजनीतिक ध्रुवीकरण को दर्शाते हैं।
लूला के सामने अब लोकतांत्रिक विश्वास बहाल करने और आर्थिक चुनौतियों से निपटने की जिम्मेदारी है।ब्राजील लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, उसकी राजनीतिक दिशा का प्रभाव क्षेत्रीय व्यापार, निवेश, पर्यावरण संरक्षण और कूटनीतिक सहयोग पर पड़ता है। लूला की जीत सामाजिक कल्याण, क्षेत्रीय साझेदारी और विकासशील देशों के बीच सहयोग को नई गति दे सकती है।
हाल के वर्षों में लैटिन अमेरिका में वामपंथी और दक्षिणपंथी राजनीतिक धाराओं के बीच प्रतिस्पर्धा तेज हुई है। ऐसे में यह परिणाम दर्शाता है कि दक्षिणपंथी राजनीति का विस्तार अपरिहार्य नहीं है। हालांकि, इसे पूरे क्षेत्र में वामपंथी लहर का संकेत मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि प्रत्येक देश की राजनीतिक परिस्थितियां, आर्थिक चुनौतियां और मतदाताओं की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।
लूला की जीत भारत के लिए भी कूटनीतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। भारत और ब्राजील दोनों बड़े विकासशील लोकतंत्र हैं तथा रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के समर्थक रहे हैं। ब्राजील के साथ मजबूत साझेदारी भारत की बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की परिकल्पना और वैश्विक भूमिका को व्यापक बना सकती है।
व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच पर्याप्त संभावनाएं हैं। भारत की औषधि निर्माण, सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटल सेवाओं की विशेषज्ञता तथा ब्राजील की कृषि, खनिज और ऊर्जा संबंधी क्षमताएं परस्पर लाभकारी सहयोग का आधार बन सकती हैं। जैव ईंधन, नवीकरणीय ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ाई जा सकती है। हालांकि, इन संभावनाओं को साकार करने के लिए व्यापारिक बाधाओं, परिवहन लागत और निवेश संबंधी चुनौतियों का समाधान आवश्यक है। निरंतर कूटनीतिक संवाद और संस्थागत सहयोग ही इस साझेदारी को ठोस आर्थिक उपलब्धियों में बदल सकते हैं।
लूला की जीत का एक महत्त्वपूर्ण पहलू ब्रिक्स से जुड़ा है। ब्राजील, रूस, भारत और चीन इसके मूल सदस्य हैं, जबकि दक्षिण अफ्रीका 2010 में इसमें शामिल हुआ। बाद में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी इसके सदस्य बने। ब्रिक्स का उद्देश्य वैश्विक शासन व्यवस्था में विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व बढ़ाना, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार को प्रोत्साहित करना तथा आर्थिक सहयोग को मजबूत करना है।
लूला के नेतृत्व में ब्राजील और भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों की भागीदारी तथा जलवायु वित्त जैसे मुद्दों पर सहयोग मजबूत कर सकते हैं। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के विस्तार और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अपनी भूमिका के अनुरूप प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा है। इस दिशा में ब्राजील का समर्थन कूटनीतिक रूप से उपयोगी हो सकता है।हालांकि, ब्रिक्स को पश्चिमी देशों के विरुद्ध एकजुट मोर्चे के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इसके सदस्य देशों के हित और रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। भारत के लिए आवश्यक है कि वह ब्रिक्स के माध्यम से सहयोग बढ़ाए, साथ ही अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता रहे।
लूला की जीत अमेरिका की लैटिन अमेरिकी नीति के संदर्भ में भी महत्त्वपूर्ण है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और लूला के बीच व्यापार, पर्यावरण संरक्षण तथा बहुपक्षीय सहयोग जैसे मुद्दों पर नीतिगत मतभेद रहे हैं। फ्लेवियो बोलसोनारो की दक्षिणपंथी राजनीति से निकटता के कारण उनकी हार को ट्रंप समर्थक राजनीतिक धारा के लिए झटके के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, इसे अमेरिका की निर्णायक हार मानना उचित नहीं होगा। दोनों देशों के व्यापक आर्थिक और रणनीतिक हित उन्हें संवाद तथा सहयोग बनाए रखने के लिए प्रेरित करते हैं।
पश्चिम एशिया के प्रश्न पर भी लूला का दृष्टिकोण उल्लेखनीय रहा है। गाजा में इजरायली सैन्य कार्रवाई की उनकी आलोचना से इजरायल की सरकार के साथ तनाव बढ़ा है। उनकी विदेश नीति में फिलिस्तीनी अधिकारों, मानवीय चिंताओं और अंतरराष्ट्रीय कानून पर जोर जारी रह सकता है। फिर भी, ब्राजील की नीतियों से पश्चिम एशिया के शक्ति संतुलन में तत्काल बड़े बदलाव की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा।
लूला के सामने राजनीतिक ध्रुवीकरण कम करने, आर्थिक स्थिरता बनाए रखने और सामाजिक असमानता से निपटने की चुनौती है। विपक्ष को मिले व्यापक समर्थन से स्पष्ट है कि ब्राजील का समाज राजनीतिक रूप से विभाजित है। रोजगार, महंगाई, सार्वजनिक सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में ठोस परिणाम देना तथा विधायी समर्थन जुटाना उनकी सरकार की प्रमुख कसौटियां होंगी। साथ ही, लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखना भी आवश्यक होगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा, व्यापारिक तनाव, जलवायु संकट और आर्थिक अनिश्चितता ब्राजील की विदेश नीति को प्रभावित करेंगे। लूला की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे घरेलू विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बीच कितना प्रभावी संतुलन स्थापित कर पाते हैं।उनकी जीत ब्राजील की लोकतांत्रिक राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम है। भारत के लिए इसका महत्त्व द्विपक्षीय व्यापार, निवेश और ब्रिक्स में सहयोग बढ़ाने तथा वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों के हितों को आगे बढ़ाने में है।
इस परिणाम को केवल किसी राजनीतिक विचारधारा की जीत या हार के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसका व्यापक संदेश यह है कि लोकतंत्र में जनता के फैसले राजनीतिक दिशा को प्रभावित करते हैं। यदि लूला सामाजिक न्याय, संस्थागत स्थिरता और बहुपक्षीय सहयोग के लक्ष्यों को ठोस नीतियों में बदल पाते हैं, तो इसका प्रभाव ब्राजील से आगे भी दिखाई दे सकता है।


