
- मेरठ खादी महोत्सव और उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल टरेड शो से मिली पहचान
लियाकत मंसूरी
नित्य संदेश, मेरठ। कभी पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले की पहचान मानी जाने वाली ब्लैक पॉटरी अब पश्चिमी यूपी में भी कारोबार का नया आधार बन रही है। मेरठ और बुलंदशहर में इस पारंपरिक कला का उत्पादन बढ़ रहा है।
बुलंदशहर के हितेश, बबुपुर के भीम प्रजापति और मेरठ से शिव प्रजापति मिट्टी आर्ट गैलरी के कारीगर श्याम सुंदर जैसे दर्जन भर से अधिक कारीगर काली मिट्टी के हुनर को बाजार की मांग से जोड़कर आगे बढ़ा रहे हैं। मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना के तहत मिलने वाली आर्थिक सहायता और मेलों-प्रदर्शनियों के जरिए बाजार तक पहुंचने के अवसर इस कारोबार को विस्तार देने में मददगार बन रहे हैं। बुलंदशहर के बबुपुर गांव निवासी भीम प्रजापति की कहानी इस बदलाव की तस्वीर पेश करती है। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्हें हाईस्कूल के बाद पढ़ाई छोड़कर पुश्तैनी काम संभालना पड़ा। हुनर था, लेकिन कारोबार बढ़ाने के लिए पूंजी नहीं थी। वर्ष 2023 में मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना के तहत तीन लाख रुपये का ऋण मिलने के बाद उन्होंने ब्लैक पॉटरी का निर्माण शुरू किया था। अपनी सफलता के दम पर वर्ष 2025 में उन्होंने मंडलीय माटीकला प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार हासिल किया था। ब्लैक पॉटरी व्यवसाय से जुडे़ हर कारीगर की कुछ ऐसी ही कहानी है।
मेरठ के जत्तीवाडा में ब्लैक पॉटरी व्यवसाय से जुडे़ शिव प्रजापति मिट्टी आर्ट गैलरी के कारीगर श्याम सुंदर ने भी अपने व्यवसाय को बढ़ाकर अच्छा मुनाफा कमाया है। वही, हितेश कुमार का कहना है कि उनके कारोबार का मासिक टर्नओवर करीब एक लाख रुपये है। परिवार के पांच सदस्यों के साथ तीन महिलाओं और दो पुरुषों को भी नियमित रोजगार मिला है। ब्लैक पॉटरी के तहत कढ़ाई, फ्राईपैन, केतली, तवा, जग, कप-प्लेट, शोपीस और सजावटी गमलों सहित कई उत्पाद तैयार कर रहे हैं।

ऋण से लेकर ट्रेड शो तक, कारीगरों को बाजार का सहारा
मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना के तहत पात्र कारीगरों को स्वरोजगार शुरू करने और कारोबार बढ़ाने के लिए ऋण के माध्यम से आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। पारंपरिक कारीगरों के सामने केवल उत्पादन करना ही चुनौती नहीं है; अपने उत्पादों के लिए नियमित खरीदार जुटाना और बाजार में पहचान बनाना भी जरूरी है। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार के द्वारा विभिन्न मेले, प्रदर्शनियां और उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो जैसे आयोजन उन्हें अपने उत्पाद प्रदर्शित करने, खरीदारों से जुड़ने और नए बाजार तलाशने का मंच प्रदान हो रहे हैं। पश्चिमी यूपी में उत्पादन बढ़ने से एनसीआर के कारोबारियों को स्थानीय स्तर पर आपूर्ति का विकल्प उपलब्ध हो रहा है।
धुएं और नियंत्रित आंच से मिलता है काला रंग
ब्लैक पॉटरी की पहचान उसका गहरा काला रंग और बारीक नक्काशी है। इसे बनाने के लिए मिट्टी को आकार देकर पहले बर्तन पकाए जाते हैं। इसके बाद चावल की भूसी और कंडों के धुएं वाले नियंत्रित वातावरण में दोबारा पकाने से बर्तनों की सतह काली हो जाती है। इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन की आपूर्ति सीमित रखी जाती है। इसके बाद बर्तनों पर बारीक डिजाइन उकेरे जाते हैं, जो उनकी खूबसूरती बढ़ाते हैं। परंपरागत लाल मिट्टी के बर्तनों में पकाने के दौरान ऑक्सीकरण से लालिमा आती है, जबकि ब्लैक पॉटरी में नियंत्रित धुएं और कम ऑक्सीजन वाला वातावरण काला रंग विकसित करने में अहम होता है। यही अंतर इसे विशिष्ट पहचान देता है।

सजावट से रसोई तक, उत्पादों की बढ़ी विविधता
ब्लैक पॉटरी अब केवल शोपीस और सजावटी गमलों तक सीमित नहीं है। कारीगर इससे कप, प्लेट, जग, केतली, तवा और फ्राईपैन जैसे उत्पाद भी तैयार कर रहे हैं। इसका आकर्षक रंग, पारंपरिक शिल्प और विशिष्ट डिजाइन इसे घर की सजावट तथा उपहार के लिए उपयोगी बनाते हैं। हालांकि, खाना पकाने और खाद्य पदार्थ रखने के लिए बने उत्पादों की सुरक्षा उनकी सामग्री, फिनिशिंग और निर्माण गुणवत्ता पर निर्भर करती है।
परिक्षेत्रीय ग्राामोद्योग अधिकारी ने ये कहा
मेरठ मंडल की परिक्षेत्रीय ग्राामोद्योग अधिकारी मान्या चतुर्वेदी का कहना है कि आजमगढ़ की पारंपरिक कला का पश्चिमी यूपी में विस्तार इस बात का संकेत है कि स्थानीय हुनर को पूंजी, बाजार और नए उत्पादों से जोड़कर रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। मेरठ और बुलंदशहर के कारीगर अब इसी विरासत को कारोबार में बदलने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।


