
• सोमवार को सभी पीले और सफेद वस्त्रों में सजकर भक्ति और उल्लास के रंगों के साथ शरद उत्सव मनाएंगे
नवीन मौर्य
नित्य संदेश, इंदौर। ‘रास का अर्थ केवल नृत्य नहीं है। जब परमात्मा अपनी प्रभुता छोड़कर भक्तों के साथ सहज व्यवहार करने लगते हैं, तब रास का अनुभव होता है।’ यह बात पूज्य इन्द्रेश जी महाराज ने रविवार को एमआर-10 स्टार चौराहे पर श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कही। रविवार की कथा के अवसर पर महाराज अपने ठाकुरजी को अर्धांगिनी किशोरीजी के साथ मंच पर लेकर पहुंचे जिनके दर्शन कर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। मंच से महाराज ने सभी को कहा कल हम सभी पीले और सफेद वस्त्रों में सजकर, भक्ति और उल्लास के रंगों के साथ शरद उत्सव में सहभागी बनेंगे और ठाकुरजी के प्रेम एवं आनंद में सराबोर होंगे।
रविवार के दिन कथा स्थल पर 30 हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं की विशेष मौजूदगी रही। गोयल परिवार द्वारा स्व. चमेलीदेवी गोयल और स्व. श्रीमन्नालाल गोयल की स्मृति में आयोजित इस कथा के लिए करीब 10 एकड़ में व्यवस्थाएं की गई हैं, जिसमें सभी के लिए प्रवेश निशुल्क है। आयोजक आशीष गोयल ने बताया श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए विशेष व्यवस्था की गई। उन्होंने बताया महाराज रविवार की सुबह गुजरात में एक ब्लड बैंक का उद्घाटन कर समय पे कथा स्थल पहुंचे कभी बच्चों के बीच चर्चा कभी दर्शनीय स्थलों के दर्शन शाम को महाकाल दर्शन के लिए निकलेंगे उनके ऐसे भागदौड़ के बीच उनके चेहरे पे सुंदर हंसी, चेहरे पे तेज़ और ताजगी का राज़ वे भागवत का वाचन ही बताते हैं। महाराज की इतनी उर्जा देख कर हम भी चकित हैं।

गोपियों के प्रेम में ऐश्वर्य भूल जाते हैं भगवान
महाराज ने रसखान की पंक्ति ‘छछिया भरि छाछ पै नाच नचायो’ का भाव समझाते हुए कहा कि ब्रज में गोपियां थोड़ी-सी छाछ के बदले कान्हा से नृत्य करने को कहती हैं। तीनों लोकों के स्वामी श्रीकृष्ण गोपियों के सामने ठुमक-ठुमककर नाचते हैं। कहीं वे माखन खाने के लिए बंदर की तरह उछलने को तैयार हो जाते हैं, तो कहीं गोपियां उन्हें अपने घर ले जाकर स्नेह से गोद में बैठा लेती हैं। महाराज ने कहा कि भगवान का यही माधुर्य भाव है, जिसमें वे अपनी प्रभुता भुलाकर भक्तों के प्रेम में बंध जाते हैं।
उत्साह से की गई भक्ति में ही मिलता है आनंद
महाराज ने इंदौर के श्रद्धालुओं के उत्साह की सराहना करते हुए कहा कि व्रत, नियम, कथा, अनुष्ठान और सेवा में शुद्धता व संयम जरूरी हैं, लेकिन इनके साथ उत्साह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भक्ति में मन लगाना केवल मनुष्य के प्रयास से नहीं, बल्कि ठाकुरजी की कृपा से भी संभव होता है। इसलिए श्रद्धालुओं को नियमित रूप से कथा सुननी चाहिए। किसी प्रसंग या लीला से जुड़ाव होने पर भक्ति में मन अपने आप लगने लगता है।
राम नाम ही परम सत्य, जीवन रहते समझें इसका महत्व
कथा में महाराज ने श्रीमद्भागवत के प्रथम श्लोक का उल्लेख करते हुए परम सत्य की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि भगवान के नाम को परम सत्य कहा गया है, क्योंकि भगवान की लीलाएं अलग-अलग युगों में समाप्त हो जाती हैं, लेकिन उनका नाम आज भी लोगों का कल्याण करता है। ‘राम नाम सत्य है’ का उद्घोष केवल अंतिम यात्रा के समय करने की बात नहीं है, बल्कि जीवित लोगों को भी यह समझना चाहिए कि धन, संपत्ति और सांसारिक उपलब्धियां स्थायी नहीं हैं। इसलिए जीवन रहते ही भगवान के नाम से जुड़ना चाहिए।
भक्ति से कष्ट सहने की शक्ति मिलती है
महाराज ने कहा कि जीवन में तीन तरह के कष्ट होते हैं- दूसरों के कारण मिलने वाले, स्वयं के शरीर या मन से जुड़े और प्रकृति के कारण आने वाले। श्रीमद्भागवत मनुष्य को भगवान से जोड़ती है और दुखों के बीच भी धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा देती है। उन्होंने कहा कि संतों के जीवन में भी शारीरिक कष्ट होते हैं, लेकिन भगवान के प्रति अनुराग उन्हें विचलित नहीं होने देता। जब जीवन का आधार भगवान बन जाते हैं, तब विपरीत परिस्थितियों में भी भक्ति का मार्ग नहीं छूटता।

इंदौर से पुराना नाता, सात दिन की कथा के लिए जताया आभार
महाराज ने इंदौर से अपने पुराने संबंधों का उल्लेख करते हुए बताया कि उनके पिता की कथा के दौरान वर्ष 1997 के आसपास उन्हें यहां छह महीने की उम्र में श्रीकृष्ण का स्वरूप बनाया गया था। उन्होंने श्रीविद्या धाम के संतों से मिले स्नेह और आशीर्वाद को भी याद किया। महाराज ने कहा कि इंदौर में व्यापार, खानपान, शिक्षा और धार्मिक आस्था की समृद्ध परंपरा है। यहां के श्रद्धालुओं का उत्साह देखकर उन्हें आनंद मिलता है।


