
नित्य संदेश। करवा चौथ केवल एक तिथि नहीं, एक भाव-दशा है। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी की वह शाम जब आकाश में चाँद थोड़ा देर से निकलता है और धरती पर हजारों आँखें उसी एक चाँद की प्रतीक्षा में टिकी रहती हैं, तो लगता है जैसे पूरा देश एक ही प्रार्थना में बंध गया हो। निर्जला व्रत, सोलह श्रृंगार, कथा और अंत में छलनी से चाँद देखना – यह क्रम सदियों से दोहराया जा रहा है, पर हर बार नया लगता है। क्योंकि इसके केंद्र में है संबंध।
एक कथा से अधिक, एक संस्कृति
पौराणिक कथाओं में करवा नाम की पतिव्रता स्त्री का उल्लेख है, जिसने अपने पति को यमराज से वापस ले लिया था। एक दूसरी कथा वीरवती की है। पर इन कथाओं का महत्व चमत्कार में नहीं, संदेश में है। ये कथाएँ कहती हैं कि प्रेम में इतनी एकाग्रता हो सकती है कि वह नियति से भी संवाद कर ले।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो यह पर्व उस समय से जुड़ा है जब पुरुष युद्ध या व्यापार के लिए महीनों घर से बाहर रहते थे। कार्तिक का महीना जब फसल कटने के बाद आता था और सर्दी की आहट होती थी, तब परिवार के पुनर्मिलन का समय होता था। ऐसे में यह व्रत पति के सकुशल लौटने और परिवार की स्थिरता की कामना बन गया। धीरे-धीरे यह सामाजिक उत्सव में बदल गया।
केवल रस्म नहीं, स्त्री की अपनी भाषा
करवा चौथ का सबसे सशक्त पक्ष यह है कि यह स्त्रियों द्वारा रचा गया और स्त्रियों द्वारा ही चलाया गया पर्व है। इसकी तैयारी, इसकी कथा, इसके गीत, इसकी विधि – सब कुछ स्त्री मंडली के बीच ही तय होता है। सुबह सरगी का आदान-प्रदान, दोपहर में कथा सुनने के लिए एकत्र होना, एक-दूसरे की मेहँदी देखना – यह केवल पूजा नहीं, एक स्त्री-समुदाय का मिलन भी है। जहाँ वह अपने सुख-दुख, अपने अनुभव बाँटती है।
आज इस पर्व पर सवाल भी उठते हैं। क्या यह पितृसत्ता का प्रतीक है? क्या प्रेम को साबित करने के लिए भूखा रहना जरूरी है? ये सवाल पूछे जाने चाहिए। किसी भी परम्परा को आँख बंद करके नहीं, आँख खोलकर जीना चाहिए। और इसी प्रश्नशीलता ने करवा चौथ को नया रूप दिया है।
पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि अब यह केवल सुहागिनों का व्रत नहीं रहा। कई पति भी अपनी पत्नी के लिए व्रत रख रहे हैं। कई अविवाहित लड़कियाँ अपने मंगेतर के लिए, कई माताएँ अपने बच्चों के कल्याण के लिए इसे रख रही हैं। जब व्रत बाध्यता से निकलकर चुनाव बन जाता है, तो वह बोझ नहीं, भाव बन जाता है।
बाजार और आधुनिकता के बीच
यह भी सच है कि करवा चौथ आज एक बड़ा आर्थिक और सामाजिक अवसर बन गया है। कपड़े, गहने, मेहँदी, ब्यूटी पार्लर, उपहार – इन सबका बाजार इस एक दिन पर केंद्रित हो जाता है। इसमें कुछ बुराई नहीं, पर हमें यह याद रखना होगा कि चमक-दमक साधन है, साध्य नहीं। अगर सोलह श्रृंगार के पीछे सोलह गुना अहंकार और दिखावा आ गया, तो पर्व का मूल माधुर्य खो जाएगा।
सोशल मीडिया ने भी इस पर्व को बदला है। अब चाँद की तस्वीर तुरंत स्टोरी पर आ जाती है। पर क्या उस तस्वीर में वह ठहराव है जो छलनी के उस पार है? तकनीक का उपयोग हो, पर अनुभूति का स्थान न ले।
असली सीख क्या है?
करवा चौथ का असली संदेश उपवास में नहीं, उपासना में है। उपवास का अर्थ है अपने प्रिय के निकट वास करना। एक दिन अपनी भूख, अपनी प्यास को रोककर यह सोचना कि मेरे जीवन में किसी और का होना कितना महत्वपूर्ण है। यह अभ्यास है – धैर्य का, त्याग का, और एक-दूसरे को केंद्र में रखने का।
जिस समाज में तलाक तेजी से बढ़ रहे हैं, रिश्ते स्क्रीन पर बन-बिगड़ रहे हैं, वहाँ करवा चौथ जैसे पर्व हमें ठहरना सिखाते हैं। ये कहते हैं कि प्रेम केवल भावना नहीं, अनुशासन भी है। उसे रोज सींचना पड़ता है।
अंत में, करवा चौथ किसी एक धर्म या समुदाय का पर्व भर नहीं। यह उस मानवीय इच्छा का उत्सव है जो चाहती है कि जो हमें प्रिय है, वह सलामत रहे, दीर्घायु हो।
इस बार जब चाँद निकले, तो केवल पति की लंबी उम्र ही नहीं, बल्कि संबंध की लंबी उम्र, उसमें सम्मान की, बराबरी की और मित्रता की भी प्रार्थना हो। क्योंकि वही प्रार्थना पूरी होती है जो दोनों को बेहतर मनुष्य बनाती है।
- सपना सीपी साहू
- समाचार संपादिका



