नित्य संदेश।
माना किरदार मेरा रावण जैसा है,
ये तो बताओ इस युग का राम कैसा है।
बुराईया है लाख मगर मैं छुपाता नहीं,
नही हूं राम …
तो खुद को मर्यादित पुरुष बताता नहीं।
माना सीता हरण का भाव व्यर्थ था,
बहन के अपमान का प्रतिशोध भी कर्तव्य था।
हां मुझे अपनी शक्तियों पर अहंकार था,
मगर ये तो मानव जीवन का व्यवहार था।
मां सीता को कुटिया से उठाया था,
मगर कभी गलत मनसा हाथ न लगाया था।
मैने अपने अभिमान का दंश भी झेला था,
सह कुटुम्ब अपने जीवन का दाव खेला था।
बताओ है सुरक्षित इस युग में छोटी छोटी कन्याएं भी,
दूध मुंही बच्चीयां, नारी, बहने, माताएं भी।
जलाते हो तुम हर वर्ष रावण मगर कैसे इसका प्रतिकार करोगे,
मारोगे कैसे मन का रावण बताओ कैसे तुम राम बनोगे।
रविन्द्र तंवर “सूर्योदय”


