
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के मदरसों से प्राप्त डिग्रियों को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में मान्यता दी जाती है। आज के कार्यक्रम से यह प्रेरणा मिलनी चाहिए कि मदरसों में उर्दू की सेवाओं को किस प्रकार आगे बढ़ाया जाए। मदरसों में साहित्य कम है या अधिक, इस पर निराश होने के बजाय उनकी सेवाओं को सामने लाने की आवश्यकता है। ये विचार प्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर ख्वाजा इकरामुद्दीन ने चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के उर्दू विभाग तथा अंतरराष्ट्रीय उर्दू विद्वान संघ (आयुसा) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘उर्दू के विकास में मदरसों की भूमिका’ विषयक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि बिहार मदरसा शिक्षा बोर्ड में अनेक विषय शामिल हैं, जिनके माध्यम से उर्दू की सेवाएँ व्यापक स्तर पर की जा रही हैं।
कार्यक्रम का आरंभ सईद अहमद सहारनपुरी द्वारा पवित्र कुरआन के पाठ से हुआ। मुहम्मद ईसा राना ने नात प्रस्तुत की। कार्यक्रम का संरक्षण उर्दू विभागाध्यक्ष प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने किया। प्रसिद्ध आलोचक एवं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर सगीर अफराहीम ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। प्रसिद्ध आलोचक तथा राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद, नई दिल्ली के पूर्व निदेशक प्रोफेसर ख्वाजा मुहम्मद इकरामुद्दीन ऑनलाइन मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। विशिष्ट अतिथि के रूप में दारुल उलूम अरबी कॉलेज, मेरठ के प्राचार्य डॉ. मुफ्ती मुहम्मद रिज़वान क़ासमी उपस्थित रहे। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली के शोधार्थी मुफ्ती राहत अली सिद्दीकी तथा सीसीएस विश्वविद्यालय की एम.ए. की छात्रा नायाब ने शोधपत्र प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का संचालन मुहम्मद आबिद अली क़ासमी ने किया तथा नमरा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
कार्यक्रम का परिचय देते हुए डॉ. इरशाद स्यानवी ने कहा कि मकतब, मदरसे और जामिया भारत सहित अन्य देशों में उर्दू की सेवा कर रहे हैं। मदरसों में शब्दों के शुद्ध उच्चारण तथा बोलने के लहजे में उतार-चढ़ाव की कला सिखाई जाती है। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी मदरसों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। मदरसों ने देश की स्वतंत्रता में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि मौलवी अब्दुल हक, मौलाना अब्दुस्सलाम नदवी, अब्दुल हलीम शरर, काजी अब्दुल वदूद, फैज़ अहमद फैज़, हसन निजामी और राजा राममोहन राय जैसी विभूतियों ने अपनी शैक्षिक, साहित्यिक और सामाजिक सेवाओं से लोगों को प्रभावित किया।
विषय का परिचय देते हुए प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि यह अलग बात है कि अनेक विश्वविद्यालय मदरसों की डिग्रियों को मान्यता देते हैं, जबकि कुछ नहीं देते। लेकिन यह सच है कि मदरसों के विद्यार्थी उर्दू तो पढ़ते हैं, परंतु उर्दू साहित्य से पूरी तरह परिचित नहीं हो पाते। हमें मदरसों में साहित्य के साथ-साथ भाषा के ज्ञान पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। मदरसों में साहित्य, संस्कृति और धार्मिक ज्ञान की शिक्षा प्राप्त करके विद्यार्थी विभिन्न क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर रहे हैं।
डॉ. मुफ्ती रिज़वान अहमद ने कहा कि स्वतंत्रता से पहले उर्दू चारों ओर प्रचलित थी, लेकिन स्वतंत्रता के बाद इस क्षेत्र में कमी आई। यह धारणा बनाने का प्रयास भी किया गया कि उर्दू भारत की भाषा नहीं है। आज भी उर्दू के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। इसके बावजूद मदरसे अपने सीमित संसाधनों के बीच उर्दू की सेवा में लगे हुए हैं। विद्यार्थियों को धार्मिक शिक्षा भी उर्दू के माध्यम से दी जाती है। मदरसों से अनेक पत्र-पत्रिकाएँ भी प्रकाशित हो रही हैं। उन्होंने कहा कि मदरसों के शिक्षक हवा और पानी की तरह उर्दू की सेवा कर रहे हैं।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रोफेसर सगीर अफराहीम ने कहा कि मदरसों के विद्यार्थी कंप्यूटर के माध्यम से भी उल्लेखनीय कार्य कर सकते हैं। मदरसों के विद्यार्थियों का फारसी भाषा पर अच्छा अधिकार होता है। उर्दू के साथ अरबी और फारसी का ज्ञान विद्यार्थियों के जीवन को बेहतर बनाने में सहायक होता है। मदरसों की सेवाओं को भुलाया नहीं जा सकता। वर्तमान समय में भी मदरसे बड़ी सेवाएँ दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि मदरसों से शिक्षा प्राप्त करके उर्दू साहित्य की सेवा करने वाली प्रमुख हस्तियों में सैयद मुहम्मद अशरफ, ख्वाजा इकरामुद्दीन, हाफिज सिद्दीक और प्रोफेसर सना उल्लाह जैसी हस्तियाँ शामिल हैं, जो आज भी साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दे रही हैं। इस अवसर पर मुफ्ती राहत अली सिद्दीकी ने ‘उर्दू के विकास में मदरसों की भूमिका’ विषय पर अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में डॉ. आसिफ अली, डॉ. शादाब अलीम, फरहत अख्तर, मुहम्मद शमशाद सहित अनेक विद्यार्थी, छात्राएँ और गणमान्य व्यक्ति ऑनलाइन जुड़े रहे।


