HomeUncategorizedभारत को विश्वगुरु बनाने का मूलमंत्र

भारत को विश्वगुरु बनाने का मूलमंत्र

प्रोफ़ेसर (डॉ.) बलराम पाणी

नित्य संदेश।भारत ज्ञान की समृद्ध एवं बहुआयामी परंपराओं का संवाहक रहा है। समकालीन भारतीय प्रतिभाएं खगोलविज्ञान,समाज सेवा, प्राचीन ज्ञान- विज्ञान तथा लोकहित के क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दे रही है। वर्तमान सरकार की भी प्राचीन भारतीय ज्ञान- परंपरा के पुनर्स्थापना, संवर्धन एवं राष्ट्रीय हितों में उसकी उपयोगिता सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर सार्थक प्रयास कर रही है।

भारत की वास्तविक शक्ति उसकी " विविधताओं में निहित एकता और समावेशी जीवन दृष्टि में प्रतिबिंबित होती है।" हर देशवासी में एकता, अनुशासन और राष्ट्र -समर्पण की भावना का विकास ही भारत को विश्वगुरु बनाने का सशक्त मूलमंत्र है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 लोकतांत्रिक संवाद एवं व्यापक लोकभागीदारी से निर्मित एक दूरदर्शी शैक्षणिक पहल है। ग्रामीण स्तर, ब्लॉकस्तर, शहरीस्तर एवं जिला स्तर पर हुए व्यापक विचार -विमर्श के आधार पर तैयार नीति भारतीय शिक्षा के पुनरुत्थान और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप उसके रूपांतरण का मार्ग प्रशस्त करती है। इसका मूल उद्देश्य शिक्षा का भारतीयकरण करते हुए उसमें भारतीय ज्ञान- परंपरा ,मौलिक चिंतन, नैतिक मूल्य, अकादमिकसंवाद एवं रोजगार परक कौशल का समन्वय स्थापित करना है । यह नीति युवाओं में आत्मविश्वास, व्यक्तित्व एवं चरित्र- निर्माण को प्रोत्साहित करते हुए औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। वस्तुतः इसका ध्येय भारतीय शिक्षा में नवचेतना का संचार कर भारत को ज्ञान, अनुसंधान एवं नवाचार के क्षेत्र में पुनः वैश्विक नेतृत्व अर्थात विश्व गुरु के लक्ष्य की ओर अग्रसर करना है।

समकालीन विश्व भौतिक समृद्धि के साथ-साथ पर्यावरणीय संकट, पारिवारिक संरचना में परिवर्तन तथा सामाजिक विविधताओं के मध्य "संतुलन " जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन चुनौतियों का समाधान प्रकृति, समाज और मानवता के बीच एक एकात्मभाव एवं सह - अस्तित्व की स्थापना में निहित है। भारतीय पर्यावरणीय संस्कृति में प्रकृति को पूजनीय मानते हुए उसके संरक्षण एवं संवर्धन की समृद्ध वैदिक परंपरा रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा ग्राम विकास एवं गो- संरक्षण के प्रसार इसी सांस्कृतिक चेतना के परिचायक हैं। वैज्ञानिक, तकनीक, सतत उत्पादन, संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग तथा पर्यावरण संरक्षण को जीवन में अपनाकर मानव कल्याण और भारत के वैश्विक गुरु बनने के संकल्प को साकार किया जा सकता है।

भारतीय समाज ऐतिहासिक रूप से जातिवाद, अस्पृश्यता, सामाजिक विभाजन तथा उच्च- निम्न के भेदभावपूर्ण मानसिकता जैसी दुर्दान्त चुनौतियों से प्रभावित रहा हैं। वैश्विक नेतृत्व की आकांक्षा रखने वाले भारत के लिए सामाजिक समरसता ,समावेशी विकास और संतुलित समृद्धि अनिवार्य है । अलगावाद, आतंकवाद एवं जातिगत संकीर्णताओं का उन्मूलन मजबूत इच्छा शक्ति और सामूहिक सामाजिक प्रयासों से ही संभव है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस चुनौती को समझते हुए दैनिक शाखाओं एवं विविध सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से सामाजिक एकता, बंधुत्व एवं सामाजिक समरसता स्थापित करने की दिशा में प्रयास कर रहा है।

भारत को वैश्विक स्तर पर अग्रणी राष्ट्र बनाने का संकल्प समाज, उद्योग जगत और युवा पीढ़ी में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा है। आर्थिक संसाधनों का विकेंद्रीकरण, शोषण पर राज्य का प्रभावी नियंत्रण,पर्यावरण संरक्षण,सतत विकास एवं सामाजिक सहिष्णुता राष्ट्रीय प्रगति और सांस्कृतिक उन्नयन के प्रमुख आधार बना रहे हैं। वैश्विक प्रतिस्पर्धा की वर्तमान दौड़ में स्वदेशी एवं आत्मनिर्भरता की अवधारणा की प्रासंगिकता निरंतर बढ़ रही है।

समाज में सकारात्मक एवं स्थायी परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा प्रतिपादित "पंच परिवर्तन की अवधारणा" महत्वपूर्ण है। इसके अंतर्गत सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वबोध, स्वदेशी ,नागरिक कर्तव्य एवं नागरिक अनुशासन को दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाने पर जोर दिया गया है। "सामाजिक समरसता " का आशय भेदभाव मुक्त समाज, कुटुंब प्रबोधन ,पारिवारिक संस्कार एवं संवाद से है।"पर्यावरण संरक्षण" , जिसके द्वारा प्रकृति एवं पर्यावरण के मध्य सामंजस्य स्थापित करके "सतत् विकासात्मक पहलुओं" को प्राथमिकता दी गई है। "परिवार प्रबोधन" जो भारतीय जीवन का मूलाधार है जिसके द्वारा परंपरागत जीवन में मूल्यों का क्रियान्वयन है। "आत्म परिष्कार एवं स्वाध्याय "जिसमें प्रत्येक स्वयंसेवक को अपने भीतर अनुशासन एवं साधना का भाव जाग्रत करने की प्रेरणा मिलती है। संतुलन, स्वबोध ,संस्कृति एवं राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करके वैश्विक गुरु की संकल्पना को प्राप्त किया जा सकता है।

विश्व गुरु के रूप में भारत की प्रतिष्ठा के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में प्रगति अतिआवश्यक एवं अनिवार्य है।इनका अनुप्रयोग मानव कल्याण ,जीवन की गुणवत्ता में सुधार एवं समाज में वैज्ञानिक चेतना के विकास हेतु होना चाहिए। विकास की अवधारणा केवल भौतिक सुख- सुविधाओं और उपभोग तक सीमित न होकर प्रकृति, पर्यावरण और मानवीय आवश्यकताओं के मध्य संतुलित एवं सतत सामंजस्य के लिए होना चाहिए।

निष्कर्षतह:भारत को वैश्विक गुरु के रूप में प्रतिष्ठित करने का मूल मंत्र उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक चेतना, ज्ञान विज्ञान की समृद्ध परंपरा का वैश्विक एवं मानवीय मूल्यों के पुनर्जागरण में निहित है। शिक्षा, अनुसंधान ,नवाचार, आत्मनिर्भरता ,सामाजिक समरसता, चरित्र -निर्माण और राष्ट्र- निष्ठा इस लक्ष्य की आधारशिलाएं हैं। भारत का हर नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति सजग, समाज के प्रति संवेदनशील और राष्ट्र के प्रति समर्पित होगा तभी सशक्त, समृद्ध एवं आत्म निर्भर भारत का निर्माण संभव होगा। भारत की वैश्विक गुरु बनने की संकल्पना किसी राष्ट्र पर प्रभुत्व स्थापित करने की नहीं, बल्कि अपने ज्ञान, विवेक, करुणा, सह- अस्तित्व और वसुधैव कुटुंबकम की भावना से संपूर्ण विश्व का मार्गदर्शन करने की है। अतः भारत को वैश्विक गुरु बनाने का वास्तविक मूल मंत्र है:-" ज्ञान में उत्कृष्टता,आचरण में शुचिता, विचारों में उदारता और कर्म में राष्ट्रनिष्ठ चरित्र।"

Share on Blogger
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Facebook Page

Most Popular

Recent Comments