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सतत् विकास लक्ष्यों की प्राप्ति जनभागीदारी एवं सामाजिक पहल से ही संभव है :प्रोफेसर बलराम पाणी

नित्य संदेश ब्यूरो

नई दिल्ली। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, दिल्ली प्रांत एवं माधव सेवा न्यास के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय व्याख्यान माला “पर्यावरण रसायन एवं सतत विकास :ज्ञान परंपराएं, चुनौतियां और संभावनाओं” पर आयोजन अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के केंद्रीय कार्यालय ‘सभागार’ में संपन्न हुआ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं   मुख्यवक्ता प्रोफेसर( डॉ.) बलराम पाणी , डीन ऑफ कॉलेजेज ,दिल्ली विश्वविद्यालय रहे। उन्होंने कहा कि पर्यावरण हमारे आसपास विद्यमान समस्त प्राकृतिक एवं जैविक घटकों के  समुच्चय का नाम है। प्रकृति ने  हमें वायुमंडल, भूमंडल एवं जल जैसे अमूल्य संसाधन प्रदान किया है, इन तीनों घटकों के बीच संतुलन बनाए रखना  पर्यावरण के लिए अनिवार्य है। सामयिक  में मानवीय गतिविधियों के कारण पर्यावरण प्रदूषण की समस्या गंभीर होती जा रही है। इस समस्या के समाधान के लिए हर व्यक्ति की पर्यावरण के प्रति सजगता, पहल, उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार एवं सकारात्मक पहल  अत्यंत  आवश्यक है। पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले वे भौतिक, रासायनिक एवं जैविक कारक जो मानव स्वास्थ्य ,संपत्ति एवं  जीव -जगत के  प्रति प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं " प्रदूषक" कहलाते हैं, जबकि इन प्रदूषकों के कारण पर्यावरण की प्राकृतिक गुणवत्ता में होने वाली हानिकारक गिरावट को "पर्यावरण प्रदूषण "कहा जाता है। अतः पर्यावरण संरक्षण एवं सतत् विकास के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जनसहभागिता, प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण एवं संतुलित उपयोग तथा  पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना समय की अनिवार्य आवश्यकता है।

प्रकृति में स्वयं को पुनर्संतुलित एवं पुनर्जीवित करने की अंतर्निहित क्षमता विद्यमान होती है, किंतु प्रदूषण की निरंतर वृद्धि इस प्राकृतिक क्षमता को क्षरण कर रही हैं। पर्यावरणीय संतुलन की स्थापना के लिए प्रदूषकों की पहचान ,उनके स्रोतों का विश्लेषण तथा उन पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है। प्रदूषण को बढ़ाने वाले विभिन्न कारकों एवं संकेतकों कोसमझना अनिवार्य है।उन्होंने "सेवेन सिस्टर्स प्रदूषक "के अवधारणा पर विचार -विमर्श करते हुए पर्यावरण एवं रसायन विज्ञान के पारस्परिक संबंधों को रेखांकित किए । उन्होंने सतत् विकास की अवधारणा को "गरुड़ पुराण" में वर्णित विचारों एवं जीवन -मूल्यों से जोड़ते हुए भारतीय ज्ञान- परंपरा और पर्यावरणीय चेतना के तादात्म्य संबंधों पर प्रकाश डालें। इस प्रकार पर्यावरण संरक्षण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, योग, संतुलित जीवन शैली तथा भारतीय ज्ञान -परंपरा का उचित समन्वय सतत विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

कार्यक्रम के संरक्षक एवं अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव, डॉ. बालमुकुंद पांडे जी ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी के प्रति हृदय तल से आभार व्यक्त किए। उन्होंने अपने उद्बोधन में इतिहास के अध्ययन की प्रासंगिकता पर बल देते हुए कहा कि इतिहास अतीत की घटनाओं का संकलन नहीं,बल्कि वर्तमान को समझने, उसके अनुभवों को संरक्षित करने तथा भविष्य को दिशा -निर्धारित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. धर्मचंद चौबे ने सभी को धन्यवाद दिए। उन्होंने सतत विकास को वैज्ञानिक एवं ऐतिहासिक आधारों पर व्याख्यायित किए।कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर प्रवीण गर्ग ने किया। उन्होंने सभी को धन्यवाद दिया।
कार्यक्रम का व्यास संचालन डॉ प्रीति उपाध्याय ,आजीवन सदस्य ,अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना नई दिल्ली ने किया। कार्यक्रमोपरांत स्वादिष्ट जलपान की व्यवस्था थी एवं उसके उपरांत सांस्कृतिक कार्यक्रमों की आकर्षक एवं सार्थक व्यवस्था थी।कार्यक्रम में डॉ.सुधाकर कुमार मिश्रा,डॉ.अनुराग मिश्रा ,डॉ. ए .के दुबे, डॉ. रमेश मिश्रा, श्री मुकेश उपाध्याय, डॉ सचिन रतन झा ,डॉ नरेंद्र शुक्ला, डॉ. रत्नेश त्रिपाठी एवं अन्य प्राध्यापक ,शोधार्थी एवं विषय विशेषज्ञ उपस्थित रहे।
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