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कोड से नहीं, विवेक से होगा न्याय! विश्व कांग्रेस में डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने भारतीय ज्ञान परंपरा से प्रस्तुत किया कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सुशासन का वैश्विक मॉडल

नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के विधि अध्ययन संस्थान के अध्यक्ष डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने ब्राजील के लोंड्रीना में आयोजित विश्व कांग्रेस में भारतीय ज्ञान परंपरा के आधार पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सुशासन की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने अपने शोध-पत्र के माध्यम से स्पष्ट किया कि तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, उसे मानवीय विवेक, संवैधानिक मूल्यों और मौलिक अधिकारों के अधीन रहना चाहिए। उन्होंने राजधर्म, न्याय-दर्शन, सम्राट अशोक के शिलालेखों और अहिंसा की भारतीय परंपरा के माध्यम से संदेश दिया कि शासन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग जनकल्याण, पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित करने के लिए होना चाहिए, न कि नागरिकों के अधिकारों को सीमित करने के लिए।
इस अंतरराष्ट्रीय विश्व कांग्रेस का विषय “शासन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता: मंच, पूर्वानुमान विश्लेषण और मौलिक अधिकार” है। लगभग 26 घंटे तक चलने वाले इस आयोजन में 24 देशों के 138 वक्ता भाग ले रहे हैं। आयोजन की अध्यक्षता पेरू के डॉ. जॉर्ज आइज़ैक टोरेस मैनरीके की संस्था ‘प्रीएमिनेंशिया यूस्तितिया’ के अंतर्विषयक मौलिक अधिकार विद्यालय द्वारा की जा रही है। कार्यक्रम का प्रसारण ब्राजील के फैकुलदादेस लोंड्रीना के विधि विद्यालय के माध्यम से यूट्यूब पर किया जा रहा है। भारत, ब्राजील, रूस, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इटली, स्पेन और अर्जेंटीना के विश्वविद्यालय तथा संस्थान भी इस आयोजन से जुड़े हैं।
जब राज्य कोड से निर्णय ले, तब नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कौन करेगा?
डॉ. त्यागी ने अपने शोध-पत्र “जहाँ कोड मिलता है विवेक से: बुद्धिमत्ता का शासन और स्वतंत्रता की रक्षा” में यह महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया कि जब सरकारें नागरिकों के बारे में निर्णय लेने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता और संगणकीय सूत्रों पर निर्भर होने लगेंगी, तब समानता, स्वतंत्रता, निजता और न्याय की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी?
उन्होंने कहा कि आज डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के माध्यम से सरकारी कल्याणकारी योजनाओं, पहचान और न्याय संबंधी सेवाओं को नागरिकों तक पहुंचाया जा रहा है। जोखिम का आकलन, लाभार्थियों का चयन, धोखाधड़ी की पहचान और पुलिस व्यवस्था में पूर्वानुमान आधारित प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इन प्रणालियों में पुराने आंकड़ों के आधार पर वर्तमान में लोगों के बारे में निर्णय लिए जा सकते हैं।
यदि इन प्रणालियों में पारदर्शिता का अभाव हो, आंकड़े पक्षपाती हों या निर्णय के पीछे के तर्क स्पष्ट न हों, तो पात्र नागरिक सरकारी योजनाओं से वंचित हो सकते हैं और निर्दोष व्यक्ति अनावश्यक निगरानी के दायरे में आ सकते हैं। इससे समानता, स्वतंत्रता और निजता जैसे मौलिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
डॉ. त्यागी ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करते समय यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि तकनीकी दक्षता के साथ मानवीय गरिमा और नागरिक अधिकारों की रक्षा भी हो। किसी संगणकीय प्रणाली का पूर्वानुमान अंतिम सत्य नहीं है। वह निर्णय लेने में सहायता कर सकता है, लेकिन विवेकपूर्ण न्याय का स्थान नहीं ले सकता।
भारतीय ज्ञान परंपरा के सात सूत्रों से समझाया कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सुशासन
डॉ. त्यागी ने भारतीय ज्ञान परंपरा के सात प्रमुख सिद्धांतों को आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता के शासन के लिए प्रासंगिक बताते हुए उनका विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया।
पहला, राजधर्म: महाभारत और कौटिल्य के अर्थशास्त्र की परंपरा के अनुसार सार्वजनिक सत्ता एक न्यास है। सरकार का दायित्व नागरिकों के प्रति उत्तरदायी रहना और जनकल्याण सुनिश्चित करना है।
दूसरा, योगक्षेम: अर्थशास्त्र का यह सिद्धांत बताता है कि सरकारी मंच और तकनीकी व्यवस्थाएं जनकल्याण को बढ़ावा दें। किसी भी पात्र व्यक्ति को तकनीकी त्रुटि या गलत आंकड़ों के कारण लाभ से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
तीसरा, दंड-नीति: राज्य की शक्ति का प्रयोग आवश्यक, संतुलित और आनुपातिक होना चाहिए। केवल किसी संगणकीय प्रणाली की भविष्यवाणी के आधार पर किसी व्यक्ति को दंडित करना उचित नहीं है।
चौथा, सत्य: उपनिषदों और न्याय-दर्शन की परंपरा के अनुसार निर्णयों में सत्यता, पारदर्शिता और तर्कों की व्याख्या आवश्यक है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लिए गए निर्णयों के आधार स्पष्ट होने चाहिए।
पांचवां, विवेक: वेदांत की परंपरा मनुष्य के विवेक को महत्वपूर्ण मानती है। स्वचालित प्रणालियों पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय अंतिम निर्णय में मानवीय समीक्षा और उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
छठा, सार्वजनिक सूचना और शिकायत निवारण: सम्राट अशोक के शिलालेख शासन में जनसुलभ सूचना और शिकायतों के निवारण की महत्ता दर्शाते हैं। आधुनिक तकनीकी व्यवस्था में भी नागरिकों को जानकारी प्राप्त करने और अपनी शिकायत दर्ज कराने की सुविधा मिलनी चाहिए।
सातवां, अहिंसा: जैन, बौद्ध और गांधीवादी परंपराओं के अनुसार किसी को हानि पहुंचाने से बचना आवश्यक है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रणालियों का निर्माण इस प्रकार किया जाना चाहिए कि उनसे भेदभाव, अनावश्यक निगरानी और किसी वर्ग के बहिष्करण का खतरा कम हो।
न्याय-दर्शन की कसौटी पर परखे जाएं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के निर्णय
डॉ. त्यागी ने भारतीय न्याय-दर्शन में वर्णित प्रमाणों की अवधारणा के आधार पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता की विश्वसनीयता और निर्णय प्रक्रिया की व्याख्या की। उन्होंने प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द और हेत्वाभास के सिद्धांतों को आधुनिक तकनीकी शासन से जोड़ते हुए कहा कि किसी भी निर्णय का आधार केवल मशीन द्वारा दिया गया निष्कर्ष नहीं होना चाहिए।
प्रत्यक्ष के अंतर्गत इनपुट आंकड़ों की सत्यता, पूर्णता और स्वतंत्र जांच आवश्यक है। अनुमान के अंतर्गत किसी प्रणाली द्वारा दिए गए पूर्वानुमान के पीछे के तर्क और आधार संबंधित व्यक्ति को समझाए जाने चाहिए। शब्द के सिद्धांत के अनुसार तकनीकी कंपनियों और विशेषज्ञों के दावों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए, न कि केवल उनके कथनों पर भरोसा किया जाए। वहीं, हेत्वाभास की अवधारणा भ्रामक सहसंबंधों, पक्षपाती संकेतकों और अप्रमाणित निष्कर्षों की पहचान करने में सहायक है।
उन्होंने डिजिटल व्यक्तिगत आंकड़ा संरक्षण अधिनियम, 2023 की धारा 8(3) का उल्लेख करते हुए आंकड़ों की पूर्णता और सटीकता के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि गलत या अधूरे आंकड़ों के आधार पर लिया गया निर्णय नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है।
डॉ. त्यागी के अनुसार, “भविष्यवाणी एक अनुमान है, वह निर्णय का मार्गदर्शन कर सकती है, पर विवेकपूर्ण न्याय का स्थान नहीं ले सकती।”
संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के अनुरूप हो सरकारी कृत्रिम बुद्धिमत्ता
डॉ. त्यागी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21, निजता के अधिकार से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के पुट्टस्वामी निर्णय तथा डिजिटल व्यक्तिगत आंकड़ा संरक्षण अधिनियम, 2023 के संदर्भ में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार उपयोग के लिए छह सुरक्षा-सिद्धांत प्रस्तुत किए।
इन सिद्धांतों में सरकारी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग के लिए स्पष्ट कानूनी आधार, आवश्यकता के अनुरूप और आनुपातिक हस्तक्षेप, प्रतिकूल निर्णयों के कारण बताने की व्यवस्था, उत्तरदायी अधिकारियों द्वारा मानवीय निगरानी, शिकायत एवं अपील का प्रभावी अधिकार तथा सरकारी कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों की सार्वजनिक जानकारी और स्वतंत्र लेखा-परीक्षा शामिल हैं।
उन्होंने नीदरलैंड की एसवाईआरआई प्रणाली, ऑस्ट्रेलिया के रोबोडेब्ट प्रकरण, अमेरिका के लूमिस मामले, ब्रिटेन के ब्रिजेज मामले और केन्या की हुडुमा नम्बा पहल का उल्लेख करते हुए बताया कि तकनीकी प्रणालियों के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी नागरिकों के लिए गंभीर समस्याएं पैदा कर सकती है। उन्होंने भारत में आधार और निजता के अधिकार से संबंधित न्यायिक निर्णयों से मिली सीख को भी रेखांकित किया।
भारतीय दर्शन और वैश्विक मानवाधिकार परंपराओं में समान संदेश
डॉ. त्यागी ने कहा कि भारतीय धर्म परंपरा, अफ्रीकी उबंटू दर्शन, कन्फ्यूशियस विचार, इस्लामी मकासिद अल-शरीया और आधुनिक मानवाधिकार परंपराओं में एक साझा विचार दिखाई देता है—प्रौद्योगिकी का उपयोग मानव गरिमा की रक्षा और जनकल्याण के लिए होना चाहिए। सत्ता और शासन की व्यवस्थाएं उन लोगों के प्रति जवाबदेह रहें, जिनके जीवन पर उनके निर्णयों का प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ के कृत्रिम बुद्धिमत्ता अधिनियम तथा संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के सिद्धांतों के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा का समन्वय किया जा सकता है। इससे भारत वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए जिम्मेदार और मानव-केंद्रित कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन की एक उपयोगी रूपरेखा प्रस्तुत कर सकता है।
डॉ. त्यागी ने दिए तीन महत्वपूर्ण सुझाव
अपने शोध-पत्र में डॉ. त्यागी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार उपयोग के लिए तीन प्रमुख सुझाव दिए।
अधिकार-प्रभाव आकलन अनिवार्य हो: सरकारी पूर्वानुमान आधारित प्रणालियों को लागू करने से पहले नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर उनके संभावित प्रभाव का आकलन किया जाए।
मानवीय समीक्षा का वैधानिक अधिकार मिले: स्वचालित प्रणालियों से प्रभावित नागरिकों को निर्णय के कारण जानने और मानवीय समीक्षा की मांग करने का प्रभावी अधिकार दिया जाए।
भारतीय ज्ञान परंपरा को नीति निर्माण से जोड़ा जाए: धर्म-आधारित कर्तव्यों और नैतिक मूल्यों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के पाठ्यक्रमों, सरकारी खरीद, निगरानी तथा नियामक प्रक्रियाओं में यूनेस्को, ओईसीडी और संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों के साथ शामिल किया जाए।
डॉ. त्यागी ने अपने संबोधन का समापन सर्वोच्च न्यायालय के ध्येय-वाक्य “यतो धर्मस्ततो जयः”, अर्थात जहां धर्म है, वहां विजय है, के उल्लेख के साथ किया। उन्होंने “धर्मो रक्षति रक्षितः”, अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है, का स्मरण कराते हुए संदेश दिया कि तकनीक की वास्तविक सफलता केवल उसकी गति और क्षमता से नहीं, बल्कि न्याय, नैतिकता, उत्तरदायित्व और मानवीय गरिमा की रक्षा करने की उसकी क्षमता से तय होगी।

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