
- मेरठ के मंडलीय खादी महोत्सव में दिखा महिला उद्यमिता का दम
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। किसी ने बुजुर्गों से मिले जड़ी-बूटियों के ज्ञान को कारोबार में बदला, तो किसी ने हर्बल उत्पाद बनाने के शौक को अपना ब्रांड बना लिया। कोई कान्हा जी की पोशाक तैयार करते-करते उद्यमी बन गई, तो किसी ने लकड़ी के खिलौनों और सजावटी सामान से अपनी पहचान बनाई। मेरठ में चल रहे मंडलीय खादी महोत्सव में आठ राज्यों से आए उद्यमियों के बीच ऐसी महिला उद्यमियों की कहानियां आकर्षण का केंद्र हैं। परिवार के सहयोग और प्रदेश सरकार की योजनाओं से इन महिलाओं ने अपने शौक को कारोबार में बदला और दूसरी महिलाओं को रोजगार भी दे रही हैं। खास बात यह है कि कुछ महिलाओं के परिवार के पुरुष सदस्य भी नौकरी छोड़कर कारोबार को आजीविका का माध्यम बना चुके हैं।
बुजुर्गों के नुस्खे से बनाया लेमन टी ब्रांड
गाजियाबाद निवासी साधना ओझा अपने ग्रीन डेजी नींबू मसाला चाय ब्रांड के साथ महोत्सव में पहुंची हैं। उन्होंने बताया कि कोरोना काल में घर के बुजुर्गों से मिले ज्ञान के आधार पर विभिन्न जड़ी-बूटियों और मसालों से काढ़ा तैयार किया था। उनके अनुसार, उस दौरान एनसीआर के 29 पुलिस थानों में इस काढ़े का इस्तेमाल किया जा रहा था। बाद में उत्पाद में बदलाव कर इसे लेमन टी ब्रांड का रूप दिया। आज उनके उत्पाद दिल्ली, बनारस, सूरत और महाराष्ट्र के कई जिलों में पहुंच रहे हैं। उनका कारोबार लाखों रुपये का है और वह दस महिलाओं को नियमित रोजगार दे रही हैं।

हर्बल उत्पादों से बनाई अपनी पहचान
मेरठ के माधवपुरम निवासी स्वाति मित्तल को हर्बल साबुन और शैंपू बनाने का शौक था। पति सचिन मित्तल के सहयोग से उन्होंने श्ऑन मेड हर्बल प्रोडक्टश् ब्रांड शुरू किया। इसके तहत नीम की लकड़ी के कंघे, हर्बल साबुन, फेसवॉश, हेयर ऑयल और बॉडीवॉश तैयार किए जा रहे हैं। उनके उत्पादों की बाजार में मांग बढ़ रही है।

कान्हा जी की पोशाकों से कारोबार तक
मेरठ के फाजलपुर निवासी राखी सिंह को कान्हा जी के कपड़े बनाने का शौक था। धीरे-धीरे यही शौक व्यवसाय बन गया। उनकी तैयार पोशाकों के साथ बच्चों के हाथ से बुने कपड़ों और सजावटी सामान की भी मांग है।

पिता की माटीकला को दे रहीं बढ़ावा
जत्तीवाड़ा निवासी रश्मि प्रजापति नौकरी के साथ पिता के माटीकला व्यवसाय में हाथ बंटाती हैं। नौकरी के बाद वह सीधे महोत्सव पहुंचकर मिट्टी के उत्पाद बेचती हैं। छुट्टी के दिन पूरा समय मेले में बिताती हैं। साथ ही बच्चों और उनके अभिभावकों को मिट्टी के बर्तन बनाना भी सिखाती हैं।

स्वयं सहायता समूह से लाखों का कारोबार
सहारनपुर की कविता को लकड़ी के खिलौने और सजावटी सामान बनाने का शौक था। परिवार के सहयोग और प्रदेश सरकार की योजनाओं से उन्होंने श्लक्ष्मी स्वयं सहायता समूहश् बनाया। इसके माध्यम से वह लाखों रुपये का कारोबार कर रही हैं। वह यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो, भारत मंडपम और विभिन्न प्रदर्शनियों में अपने उत्पाद प्रदर्शित कर चुकी हैं।
हुनर को बाजार देने पर जोर
प्रदेश सरकार की खादी, ग्रामोद्योग, माटीकला और स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी योजनाएं उद्यमियों को प्रोत्साहन और बाजार के अवसर उपलब्ध कराने का माध्यम हैं। मंडलीय खादी महोत्सव भी इन उद्यमियों को अपने उत्पादों के प्रदर्शन और नए ग्राहकों तक पहुंचने का मंच दे रहा है।
इन महिलाओं की सफलता बताती है कि पारंपरिक ज्ञान और घरेलू हुनर को सही अवसर मिले तो वह कारोबार का रूप ले सकता है। परिवार के सहयोग से आगे बढ़ते ये उद्यम महिला सशक्तीकरण, स्वरोजगार और स्थानीय रोजगार सृजन की मिसाल बन रहे हैं।


