HomeUncategorized"एक ज्वलित महादीप, महर्षि दयानंद सरस्वती "

“एक ज्वलित महादीप, महर्षि दयानंद सरस्वती “

नित्य संदेश। राज महल के द्वार प्रहरी , नत मस्तक , कर बद्ध हो एक ओर हट गए । महर्षि ने धीर पगों से महल में प्रवेश किया । प्रातः काल का अरुण रवि , महल के प्रांगण में उतर कर, अपने सुकोमल रश्मिकरों से , युग प्रवर्तक महर्षि दयानंद सरस्वती के चरण स्पर्श कर रहा था । महर्षि ने राजमहल के एक भृत्य से पूछा —

महाराज कहां हैं मित्र ? भृत्य ने नत मस्तक हो मौन भाव से राज शयनकक्ष की ओर संकेत कर दिया । महर्षि , शयनकक्ष की ओर बढ़े , तभी कक्ष का द्वार खुला और अस्त व्यस्त वस्त्र , बिखरे केश , संवारते हुए एक सुन्दर ,युवती बाहर आई । शीघ्रता में प्रणाम करते हुए, महल से बाहर जाने लगी । उक्त महिला के पीछे ही उनींदे से स्वयं महाराज बाहर आए । महर्षि को सम्मुख देख अचकचाते हुए दंडवत प्रणाम किया । महर्षि ने प्रश्न किया —
राजन् , क्या ये महारानी हैं ?
— नहीं भगवन् ।
— तब ये आपके कक्ष में कैसे ?
महाराज , लज्जा से मस्तक झुकाए मौन खड़े थे ।
महल प्रांगण में महर्षि के गुरु गंभीर स्वर गूंज उठे —
” राजन , आप क्षत्रिय हैं , सिंह हैं , आपके पार्श्व में सिंहनी शोभा देती है , कुतिया नहीं । “

इन शब्दों ने जहां राजा के विवेक को झिंझोड कर जगा दिया वहीं , महल के द्वार पर खड़ी वैश्या , मुन्नीबाई के हृदय में क्रोध की अग्नि भड़का दी । यह सन्यासी , उसे अपने कलुषित व्यवसाय का शत्रु लगने लगा ।उसने निश्चय किया कि जिस व्यक्ति के कारण उसके व्यवसाय , उसकी आजीविका , उसके जीवन पर संकट घिर आया है , उसे जीवित नहीं रहना चाहिए । मैं इस सन्यासी को जीवित नहीं छोड़ूंगी । मैं इसके प्राण ले लूंगी । पर कैसे ?


यह सन्यासी अत्यंत लोकप्रिय है , जगत्पूज्य है । इसके समर्थ अनुयाई मुझे ऐसा नहीं करने देंगे । मुन्नीबाई को प्रतिशोध के भाव ने क्रोधांध बना दिया था ।


उसने महर्षि के भोजन निर्माता जगन्नाथ को धन दे कर अपने षड्यंत्र का भागीदार बना लिया । गुप्त षड्यंत्र की योजनानुसार जगन्नाथ ने एक सांझ , महर्षि के भोजन में तीक्ष्ण विष मिला दिया । भोजनोपरांत महर्षि को आर्यसमाज की एक विराट सभा में प्रवचन करना था ।
प्रवचन के मध्य में ही महर्षि को विष का आभास हो गया ।


विष से महर्षि का पुराना परिचय था । अनेक बार उन्हें विष दिया गया था , पर हर बार उन्होने यौगिक क्रियाओं द्वारा अपने शरीर से विष निकाल दिया था ।
परंतु मुन्नीबाई , महर्षि की योग सिद्धियों को जानती थी अतः उसने ऐसे समय विष का प्रयोग किया जब महर्षि को विष निवारण का समय न मिल सके ।
और देश के दुर्भाग्य से ऐसा ही हुआ ।


प्रवचन के मध्य , महर्षि के शरीर में विष रचने लगा पर उन्होने प्रवचन स्थगित नहीं किया और उनके संपूर्ण शरीर में तीव्रता से विष फैल गया ।प्रवचन की समाप्ति तक , शरीर का विष , यौगिक क्रियाओं की सीमा लांघ चुका था ।


प्रवचनोपरांत , लड़ खड़ाते हुए महर्षि अपनी कुटिया में लौटे और अपने शिष्यों को विष की सूचना दी । तुरंत चिकित्सक बुलाए गए । परीक्षणोपरांत चिकित्सक ने बताया कि शरीर का विष औषधि की सीमा भी पार कर चुका है , अब कोई उपचार प्रभावी नहीं होगा ।


षड्यंत्र सफल हो रहा था , आर्य जगत में शोक जन्य आक्रोश छा गया । शिष्यों के प्रयास से मुन्नीबाई का गोपन षडयंत्र प्रकट हो गया ।
भय और आत्म ग्लानि से भोजन निर्माता जगन्नाथ , महर्षि के चरणों पर सिर पटक पटक कर रोने लगा । विष की असह्य पीड़ा के मध्य महर्षि ने मधुर स्मित के साथ अपने विषदाता को अपने हृदय से लगाया और कहा —


जगन्नाथ , तुमने जो किया वह उचित नहीं किया , मेरे प्रति , तुमने जो अपराध किया है , उसे मैं क्षमा करता हूं ।


पर मेरे शिष्य , तुम्हें कभी क्षमा नहीं करेंगे । इसलिये मित्र , तुम यह धनराशि लो और मेरे शिष्यों के आने से पूर्व सुदूर नेपाल की ओर भाग जाओ ।


कठोरतम दंड की प्रतीक्षा में खड़ा जगन्नाथ आश्चर्य चकित हो अपलक महर्षि को निहार रहा था । उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इस पृथ्वी पर कोई ऐसा मनुष्य भी हो सकता है जो अपने विषदाता को धन , जीवन और सुरक्षा का दायित्व दान दे सके ! उसकी जड़ता को तोड़ते हुए महर्षि ने उसे पकड़कर झकझोर दिया और पुनः कहा —
शीघ्रता करो मित्र , वे लोग आ गए तो तुम्हारे प्राण नहीं बच सकेंगे ।जाओ सुखी रहना ।


सिसकते हुए जगन्नाथ पुनः महर्षि के चरणों लिपट गया , महर्षि ने पुनः उसे उठा कर कहा — जाओ मित्र , अपनी आत्मा को जगाओ , प्रभु तुम्हें सद् बुद्धि दें ।
रोते हुए जगन्नाथ चला गया और महर्षि , वे कुटिया के एकांत में शैय्या पर बैठे अपने जीवन का आकलन कर रहे थे । स्मृति के चित्र पटल पर , जीवन का अतीत जाग उठा ।


बाल्यकाल में पिता श्री के आदेश तले महाशिवरात्रि के कठोर व्रत का अनुपालन , शिव मंदिर में शिव दर्शन की उत्कट अभिलाषा से सायास रात्रि जागरण , चूहों द्वारा नैवेद्य भक्षण , शिव जी के प्राकट्य की टूटती आशा , पिता श्री का संकेत कि सच्चे शिव तो कैलास पर्वत पर कहीं रहते हैं और फिर उसी बाल्यावस्था में गृह त्याग कर नन्हे बाल चरणों से कैलास तक कष्टप्रद अनथक यात्रा तब भी शिव दर्शन न होने पर अंधी शिव शोधन यात्रा, जिसने मूलशंकर को दयानंद के रूप में मथुरा पहुंचा दिया , प्रज्ञाचक्षु दंडी स्वामी विरजानंद जी के कुटी द्वार पर । और यही कुटिया दयानंद को महर्षि दयानंद बनाने वाली महनीय कुटिया बन गई । यहीं से तत्व ज्ञान का प्रसाद पाया और गुरु दक्षिणा की संपूर्ति में यही ज्ञान, जन जन तक पहुंचाने के लिए पांव पैदल, एकाकी निकल पड़े दयानंद ।


हरिद्वार के कुंभ मेले में कोपीन धारी दयानंद द्वारा ” पाखंड खंडिनी पताका ” गाड़ कर जो यात्रा प्रारंभ हुई वह अनेक शास्त्रार्थों से होते हुए आर्यसमाज की स्थापना तक पहुंची । आज राष्ट्र और समाज जाग उठा है ।


महर्षि के पुरुषार्थ से हिंदू मतानुयायी अपने मूल आधार वेदों की ओर लौट रहे हैं । संपूर्ण पंजाब ,हरियाणा ,उत्तरप्रदेश ,राजस्थान ,मध्यप्रदेश ,गुजरात , बंगाल ,बिहार , उड़ीसा , और भारत के अधिकांश भाग में आर्य समाज , सशक्त हो कर अंध विश्वासों का उन्मूलन कर रहा है ।


स्वराज्य के लिये मुखर प्रयास हो रहे हैं ।नारी जाति को शिक्षा और सम्मान मिलने लगा है । दलित और शूद्र, अब पवित्र वैदिक ऋचाओं से यज्ञ करने लगे हैं ।


अपनी कुटिया में शैय्या पर लेटे महर्षि के मुख पर असीम शांति के भाव थे । शरीर के अंग प्रत्यंग से विष फूट फूट कर निकल रहा था । प्रातः अंग्रेज चिकित्सक , महर्षि के प्रशान्त मुख को देख कर आश्चर्य चकित रह गए । उनके अनुसार तो इस विष से व्यक्ति मर्मांतक पीड़ा में तड़पता
है , वह स्थिर रह ही नहीं सकता , चीखता है , पीड़ा के अतिरेक से पगला उठता है । पर यह महायोगी महर्षि दयानंद , रोम रोम से बहते विषाक्त रक्त के मध्य
स्मित वदन ,शांत स्वरों से अपने शिष्यों को उपदेश दे रहे थे ।


कुटिया के एक कोने में खड़े महानास्तिक श्री गुरुदत्त , जो ईश्वर के अस्तित्व को ही नकारते थे वे भी महर्षि के इस स्वरूप को देख कर चकित थे , उनका जिज्ञासु मन पूछ ही उठा — ” मानवीय सीमाओं से परे यह अतिमानवीय सहन शक्ति , आप में कहां से आई ?
महर्षि ने प्रशांत स्वर से उत्तर दिया —-
आप जिसे नहीं मानते , उसी परम पिता की कृपा से मित्र , उसका अस्तित्व है , और वह अपने सद् भक्तों में ऐसी क्षमताएं भी जगाता है ।
उस महा नास्तिक का उद्दंड मस्तक झुक गया , और इन निर्णायक क्षणों में वह धुर विरोधी , महर्षि का अनुगत हो गया ।


अजमेर आर्य समाज की उस कुटिया में , कार्तिक अमावास्या , दीपावली के दिन , प्रातः बेला में , महर्षि ने शिष्यों से कहा —
सब द्वार गवाक्ष खोल दो ,
पूर्ण पद्मासन में बैठ कर उन्होने वाचिक चिन्तन किया —
“हे प्रभो , तेरी यही इच्छा है , अस्तु। तेरी इच्छा पूर्ण हो ।
तू ने अच्छी लीला की । ओ३म् ।”
इन्ही शब्दों के साथ जगद्गुरु देव दयानंद ने प्राणायाम साध कर ब्रह्म सार के मार्ग से अपने प्राण विसर्जित कर दिये । यह मृत्यु नहीं , स्व का विसर्जन था , महा प्रयाण था , मोक्ष शिखर का आरोहण था ।
उस रात भारत भर में करोड़ों दीप प्रज्वलित कर यह महादीप सदा के लिये शांत हो गया।


तमसो मा ज्योतिर्गमय
ओ३म् शांति शांति शांति ।

                  मैं 
आर्य
जीवन

— श्री जीवन प्रकाश आर्य
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