Homeसाहित्य"मंदिर के दिये "

“मंदिर के दिये “

नित्य संदेश। राखी , जल्दी करो , अभी बाजार भी चलना है न , पटाखे ख्ररीदने ।हां हां बाबा , कर तो रही हूं । अच्छा आप नाश्ता शुरू करो , मैं बस ,चाय छान कर ला रही हूं ।राहुल , नाश्ता करते हुए आठ वर्षीया नव्या का उत्साह देख रहा था , दीवाली की उमंग , पूरे घर में बिखर रही थी ।

किचिन में बर्तन साफ करती श्यामा की दस वर्षीया बिटिया कोमल , तृषित आंखों से नव्या के नए कपड़ों को , अपनी पुरानी फ्राॅक से तौल रही थी । किचिन में रखी मिठाइयां , घर की सजावट , रंग रोगन ,सारा कुछ वह अपनी प्यासी आंखों से पी रही थी । पिता नहीं थे उसके , घोर दरिद्रता में श्यामा ही अपनी बच्ची को पाल रही थी । पर राखी ! राखी को कोमल की भूखी आंखें सदैव चुभती थीं । यह पितृ हीन बच्ची , राखी से प्रायः डांट खाती थी । आज भी ऐसा ही हुआ । कोमल , तू भी जा न , तेरे घर भी तो दिये लगाने होंगे ? जी , जाती हूं आंटी ।

बोझिल कदमों से , नव्या की फ्राॅक देखते हुए कोमल चली गई ।पूजन के बाद , राखी , राहुल और नव्या , दीवाली के दिये सजाने लगे । राहुल ने जलते दियों की एक थाली उठाई , एक मिठाई का और एक दूसरा पैकेट बगल में दबाया और बोला — आओ राखी , चलो, मंदिर में भी दिये सजा आएं । नव्या की अंगुली थाम कर राखी भी राहुल के पीछे चल पड़ी । मंदिर अभी दूर था पर मार्ग में ही एक कच्चे अंधेरे घर के द्वार पर राहुल के पैर थम गए । यह श्यामा का घर था । द्वार वैसे ही उढका हुआ था । द्वार खोल कर राहुल ने निशब्द अंदर प्रवेश किया । राखी और नव्या भी साथ ही थीं । अंदर ,केवल एक दिया जल रहा था , उसी के सामने , एक फटी पुरानी चटाई पर उदास सी श्यामा और कोमल बैठीं थीं ।

घर के बाहर , दूर दीवाली पसरी थी पर कोमल और श्यामा के मन में अभावों का अंधेरा बिखर रहा था । भीगे स्वर में राहुल ने पुकारा — कोमल , उठो बेटा , दिये नहीं लगाओगी अपने घर में ? अचकचा कर श्यामा उठ खड़ी हुई — अरे दीदी , बाबूजी ,, आप लोग , यहां मेरे घर में ? हाथ के पैकेट कोमल को पकड़ाते हुए राहुल ने उत्तर दिया — हां श्यामा , आज दिवाली का त्योहार है और तुम ऐसे उदास बैठी हो , लो ये नए कपड़े पहन कर आओ , फिर दिये भी तो सजाने हैं बाहर , ।

अभिभूत सी श्यामा , कोमल के साथ अंदर चली गई तो राखी ने टहोका मार कर राहुल से पूछा — मंदिर के दिये , यहां लगाओगे ? — हां। पगली , यही तो श्रम और ममता का जागृत मंदिर है । इससे बड़ा और पवित्र मंदिर और कहां मिलेगा ??

मैं कुटिया का दीपक जीवन

— श्री जीवन प्रकाश आर्य

Share on Blogger
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Facebook Page

Most Popular

Recent Comments