
गाँव की याद
वो मिट्टी के घरौंदे,
वो कागज़ की नाव
वो चिड़ियों के घोंसले,
वो पेड़ों की छाँव,
वो गायों का आना,
कौओं की कांव-कांव,
वो कोयल की कूक,
अपनों से ज्यादा अपनें थे
लोग जहां के,
ये कहां के लिए चले थे हम,
कहाँ आ गए?
ये सब वो घर-बार नहीं,
ये वो दर-ओ-दीवार नहीं,
हाय! कहाँ गया मेरा गाँव,
दर-दर भटक रहे हैं हम,
हर खिड़की को तक रहे हम,
अनजानी-सी शक्लें सबकी,
अनजानों से नाम है।
किससे पूछूँ पता मैं अपना,
सब हैं गूँगे या ये बूत हैं,
सबकुछ यहां पर साबूत है।
टूट रहे हैं सारे सपने,
छूट रहे हैं फिर सब अपने,
छाले पग के फूट रहे हैं,
पत्थरों पर पड़ रहे हैं पाँव
कैसे? कहाँ? ढूँढू मैं उसको
हाय! कहाँ गया मेरा वो गाँव।

—वर्षा प्रतीक व्यास


