
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। सीजीएचएस मेरठ में कथित 50 लाख रुपये की रिश्वत मांगने के मामले में आरोपी बनाए गए रईस अहमद को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की पीठ ने याची को विशेष न्यायाधीश, एंटी करप्शन, सीबीआई न्यायालय गाजियाबाद के समक्ष 15 दिनों के भीतर डिस्चार्ज प्रार्थना पत्र दाखिल करने की अनुमति दी है।
कोर्ट ने संबंधित अदालत को प्रार्थना पत्र पर गुण-दोष के आधार पर शीघ्र निर्णय लेने का निर्देश देते हुए अगले 30 दिनों तक याची के विरुद्ध किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है।याची की ओर से अधिवक्ता सुनील चौधरी ने पक्ष रखा। याचिका में आरोपपत्र और तलबी आदेश को चुनौती दी गई थी। मामला गाजियाबाद स्थित विशेष न्यायाधीश, एंटी करप्शन, सीबीआई की अदालत में लंबित है।
अधिवक्ता सुनील चौधरी ने बताया कि रईस अहमद पिछले करीब 25 वर्षों से डॉ. आशीष जैन के संस्थानों जेएमसी मेडिकल सिटी, हाईफील्ड स्पेशलिटी हॉस्पिटल एवं जैन मेडिकल स्टोर मेरठ में अकाउंटेंट के रूप में कार्यरत थे। संबंधित संस्थान सीजीएचएस के पैनल पर हैं। बिलों के भुगतान व अन्य प्रशासनिक कार्यों के सिलसिले में वह डायरेक्टर डॉ. आशीष जैन के निर्देश पर सीजीएचएस कार्यालय जाया करते थे।
याचिका के अनुसार, 8 जुलाई 2025 को सीजीएचएस मेरठ के तत्कालीन एडिशनल डायरेक्टर डॉ. अजय कुमार और ऑफिस सुपरिंटेंडेंट लवलेश सोलंकी ने अस्पताल के निरीक्षण में पाई गई कथित कमियों पर कार्रवाई न करने के बदले 50 लाख रुपये की रिश्वत मांगी थी। डायरेक्टर के निर्देश पर रईस अहमद अस्पताल के कर्मचारी व शिकायतकर्ता विशाल कुमार के साथ रिश्वत की पहली किस्त के रूप में पांच लाख रुपये लेकर सीजीएचएस कार्यालय पहुंचे थे। वहां लवलेश सोलंकी ने उन्हें अगले दिन रकम लेकर आने को कहा। इसके बाद रईस अहमद कथित रकम वाला बैग लेकर लौट रहे थे, तभी रास्ते में सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
याची पक्ष का कहना है कि अस्पताल के कर्मचारी विशाल कुमार की शिकायत पर सीबीआई ने डॉ. अजय कुमार और लवलेश सोलंकी के विरुद्ध मामला दर्ज किया था। रईस अहमद किसी अवैध लेन-देन के लाभार्थी नहीं थे, बल्कि डायरेक्टर के निर्देश पर गए थे। शिकायतकर्ता विशाल ने उनके विरुद्ध कोई शिकायत नहीं की, न ही डॉ. आशीष जैन व विशाल ने अपने बयानों में उन्हें आरोपित किया। सीबीआई ने उन्हें फर्जी तरीके से फंसाया, जबकि उन्हें गवाह बनाया जाना था। उनके विरुद्ध कोई सबूत व गवाह नहीं है।
बहस के दौरान अधिवक्ता सुनील चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट के नीरज दत्ता बनाम स्टेट तथा बी. जयराज बनाम स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश के निर्णयों का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत रिश्वत की मांग और बरामदगी दोनों साबित होने पर ही सजा का प्रावधान है। केवल बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। कथित रकम पास होने मात्र से रिश्वत मांगने या स्वीकार करने में संलिप्तता स्वतः सिद्ध नहीं होती।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याची को 15 दिनों के भीतर डिस्चार्ज प्रार्थना पत्र दाखिल करने की अनुमति दी और 30 दिनों तक दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाते हुए याचिका निस्तारित कर दी। इस पर सीबीआई ने कोई आपत्ति नहीं की।


