
- जलती मटकी के साथ चरी नृत्य और 13 मंजीरों की झंकार पर तेरहताली की प्रस्तुति ने बांधा समां
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। मिट्टी के बर्तनों की सौंधी महक और शिल्पकारों की रचनात्मकता के बीच सजे माटीकला मेले में शुक्रवार को राजस्थान की लोकसंस्कृति ने अपनी अनूठी छटा बिखेरी। घुंघरुओं की लय, मंजीरों की झंकार और लोकगीतों की मधुर तान ने मेले के माहौल को सांस्कृतिक उत्सव में बदल दिया।
राष्ट्रीय गौरव पुरस्कार से सम्मानित लोककलाकार डॉ. विजय पाल सांवरिया ने घूमर, चरी, कालबेलिया और तेरहताली की मनमोहक प्रस्तुतियों से दर्शकों को लोककला की जीवंत दुनिया की सैर कराई। सिर पर जलती मटकी रखकर नृत्य का अद्भुत संतुलन हो या 13 मंजीरों की झंकार पर थिरकते कदम, हर प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।उत्तर प्रदेश माटीकला बोर्ड की ओर से आयोजित क्षेत्रीय माटीकला मेला-2026 में सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत राजस्थान के लोकप्रिय लोकगीत ‘केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देश’ से हुई। इसके बाद डॉ. सांवरिया ने चरी नृत्य की प्रस्तुति दी। सिर पर मटकी रखकर उसमें जलती आग के साथ संतुलन साधते हुए नृत्य करना उनके कौशल और साधना का अनूठा प्रदर्शन रहा।

इसके बाद ‘धरती धोरा री…’ गीत के माध्यम से उन्होंने राजस्थान के थार मरुस्थल के रेतीले धोरों और वहां की सांस्कृतिक विरासत को मंच पर जीवंत कर दिया। कालबेलिया नृत्य के दौरान ‘काल्यो कूद पड़ो मेला में…’ गीत पर परात और गिलास के ऊपर थिरकते कदमों ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया। पूरा पंडाल तालियों से गूंज उठा। इसके बाद तेरहताली नृत्य ने कार्यक्रम में रोमांच का नया रंग भर दिया।
राजस्थान के लोकदेवता बाबा रामदेव की आराधना में गाए जाने वाले ‘रूण झुण बाजे…’ गीत पर शरीर के विभिन्न हिस्सों में 13 मंजीरे बांधकर उनकी लयबद्ध झंकार के साथ नृत्य प्रस्तुत किया गया। इस अनूठी कला ने दर्शकों को राजस्थानी लोकपरंपरा की गहराई से परिचित कराया। लोकधुनों की लय पर कई दर्शक भी अपने कदम थिरकाने से नहीं रोक सके।

बचपन की रुचि से लोकविरासत के संवाहक बने डॉ. सांवरिया
राजस्थान के अलवर जिले के मूल निवासी डॉ. विजय पाल सांवरिया को बचपन से ही नृत्य का शौक रहा है। समय के साथ यही रुचि राजस्थान की लोककला और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का उनका जुनून बन गई। वह स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय मंचों तक अपनी प्रस्तुतियों के जरिए लोकनृत्य की समृद्ध परंपराओं को पहचान दिलाने और युवाओं को भारतीय संस्कृति की विविधता से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
वर्तमान में वह छावनी परिषद द्वारा संचालित सीएबी इंटर कॉलेज में हिंदी प्रवक्ता और एनसीसी अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। डॉ. सांवरिया ने कहा कि माटीकला जैसे मेलों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होते रहना चाहिए। ऐसे मंच लोक विरासत को संजोने वाले कलाकारों को पहचान और प्रोत्साहन देते हैं। साथ ही विलुप्त होती लोकपरंपराओं को बचाने और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कार्यक्रम का संचालन शैल जगोता ने किया। 72 यूपी बटालियन एनसीसी की कमान अधिकारी कर्नल वंदना ग्रोवर और बटालियन के स्टाफ ने डॉ. सांवरिया को बधाई देते हुए भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं। इस अवसर पर जिला ग्रामोद्योग अधिकारी मान्या चतुर्वेदी, आलोक सिसोदिया आदि मौजूद रहे।


