नित्य संदेश। दीपावली केवल दीप जलाने का पर्व नहीं,बल्कि अपने भीतर झाँकने और समाज के प्रति अपने दायित्व को समझने का अवसर भी है। हर वर्ष हम अपने घरों को ज्योतिर्मय करते,माँ लक्ष्मी का स्वागत कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। लेकिन क्या कभी हमने विचार किया कि जिस समाज में हम समृद्धि का उत्सव मना रहे हैं,वहाँ कितने घर ऐसे हैं,जहाँ त्योहार की खुशियाँ भी आय और खर्च के गणित में उलझकर रह जाती हैं? जब बाजारों में करोड़ों की खरीदारी होती है,तब क्या हम उन परिवारों की चिंता करते हैं,जिनके लिए बच्चों को नए कपड़े दिलाना भी एक बड़ी उपलब्धि है? भारत की अर्थव्यवस्था आज विकास के नए आयाम छू रही है। बड़े उद्योगों का विस्तार हो रहा है,महँगी कारों और आलीशान मकानों का बाजार बढ़ रहा है तथा आधुनिक सुविधाओं का दायरा विस्तृत हो रहा है। लेकिन इसी चमक के बीच एक दूसरा भारत भी है,जहाँ छोटा दुकानदार ग्राहकों की प्रतीक्षा करता है,मजदूर नियमित रोजगार की उम्मीद में भटकता है और मध्यमवर्गीय परिवार बढ़ते खर्चों के बीच अपनी बचत बचाने की कोशिश करता है। अर्थशास्त्र में आर्थिक प्रगति की इस असमान तस्वीर को ‘K-Shaped Recovery’ कहा जाता है। इसमें अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा तेजी से आगे बढ़ता है,जबकि दूसरा अपेक्षाकृत धीमी गति से आगे बढ़ता है या आर्थिक दबावों का सामना करता है।
एक ही देश में किसी के लिए दीपावली पर नई कार खरीदना सामान्य बात है,तो किसी के लिए घर में मिठाई लाना भी बजट बिगाड़ने वाला खर्च हो सकता है। यह अंतर केवल आय का नहीं,अवसरों और जीवन की परिस्थितियों का भी है। इसलिए आर्थिक विकास की सफलता को केवल GDP की वृद्धि,शेयर बाजार की चमक या बड़े कारोबारियों के मुनाफे से नहीं आँका जा सकता। वास्तविक कसौटी यह है कि विकास का लाभ आम आदमी की थाली, उसके रोजगार,उसकी बचत और उसके बच्चों के भविष्य तक कितना पहुँचा है।दीपावली के बाजारों में सबसे अधिक अनदेखे चेहरे उन लोगों के हैं,जिनकी मेहनत से त्योहार की शोभा दिखाई पड़ती है। मिट्टी के दीये बनाने वाला कुम्हार,मिठाई तैयार करने वाला कारीगर,सड़क किनारे सामान बेचने वाला छोटा व्यापारी और घरों को सजाने वाला श्रमिक ये सभी हमारी खुशियों के निर्माता हैं। विडंबना यह है कि दूसरों के घरों को प्रकाशमयी करने वाले इन हाथों के अपने घरों में कभी-कभी अभाव का अंधेरा बना रहता है। क्या यह उचित नहीं कि दीपावली पर दीये खरीदते समय हम उस कुम्हार के परिवार की आजीविका के बारे में भी सोचें? क्या हमारी खरीदारी किसी छोटे दुकानदार के घर में भी खुशियों का दीप जला सकती है?
यह प्रश्न अमीर और गरीब के बीच संघर्ष खड़ा करने का नहीं,बल्कि समृद्धि के प्रति हमारी समझ को व्यापक बनाने का है। किसी व्यक्ति का धनवान होना गलत नहीं है,उद्योगों का बढ़ना भी आवश्यक है और उद्यमियों की सफलता देश की प्रगति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन एक स्वस्थ समाज वह है,जहाँ सफलता के अवसर केवल कुछ लोगों तक सीमित न रहें,जहाँ मेहनत करने वाला व्यक्ति सम्मानजनक जीवन जी सके और किसी परिवार की गरीबी उसके बच्चों के सपनों के मार्ग की स्थायी बाधा न बने। जिस समाज में धन का सम्मान हो,लेकिन श्रम का सम्मान न हो,जहाँ सफलता का उत्सव मनाया जाए,लेकिन अभाव से जूझते व्यक्ति की पीड़ा अनदेखी कर दी जाए,वहाँ विकास की कहानी अधूरी रह जाती है। आज आवश्यकता केवल आर्थिक विकास की नहीं,बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता की भी है। हमें अपने बच्चों को महँगे उपहार देने के साथ यह संस्कार भी देना चाहिए कि किसी वस्तु का मूल्य केवल उसकी कीमत से नहीं,बल्कि उसे बनाने वाले श्रमिक की मेहनत से भी तय होता है। हमें यह समझना होगा कि किसी जरूरतमंद की सहायता करना दया का प्रदर्शन नहीं,बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व है। किसी गरीब परिवार के साथ खुशियाँ बाँटते समय उसकी गरिमा और आत्मसम्मान बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
इस दीपावली हम एक छोटा,लेकिन सार्थक संकल्प लें। स्थानीय कारीगरों से दीये खरीदें,छोटे दुकानदारों को प्रोत्साहित करें,जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा में सहयोग करें और उत्सव को दिखावे तथा अनावश्यक खर्च की प्रतिस्पर्धा न बनने दें। हमारी छोटी-सी पहल किसी परिवार के लिए बड़ी राहत बन सकती है। समाज में परिवर्तन हमेशा बड़े भाषणों या बातों से नहीं आता,कभी-कभी वह हमारी छोटी-छोटी संवेदनशील आदतों से शुरू होता है। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि किसी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि केवल ऊँची इमारतों,चमकते बाजारों और बढ़ती संपत्ति में नहीं बसती। वह उस मजदूर की सुरक्षित आजीविका में भी बसती है,उस किसान की संतुष्टि में भी,उस कर्मचारी की आर्थिक सुरक्षा में भी और उस बच्चे की आँखों में भी,जो बिना अभाव के भय के अपने भविष्य के सपने देख सके। दीपावली पर माँ लक्ष्मी का पूजन करते समय यदि हम अपने आसपास के लोगों के जीवन में खुशहाली लाने का संकल्प भी लें,तो त्योहार का सामाजिक अर्थ ओर गहरा हो जाएगा। आखिर प्रकाश का उद्देश्य केवल अपने घर का अंधेरा मिटाना नहीं,बल्कि जहाँ संभव हो,दूसरों के जीवन में भी उजाला पहुँचाना है।
इस दीपावली हमें केवल यह नहीं देखना चाहिए कि हमारे घर में कितने दीप जले,बल्कि यह भी सोचना चाहिए कि हमारे कारण से कितने चेहरों पर मुस्कान आई। क्योंकि किसी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि तब नहीं होती,जब उसके कुछ घर जगमगाते हैं,असली समृद्धि तब होती है,जब कोई घर अभाव के कारण अंधेरे में रहने को विवश न हो। आइए,इस दीपावली ऐसा समाज बनाने का संकल्प लें,जहाँ धन के साथ संवेदना,सफलता के साथ विनम्रता और समृद्धि के साथ साझेदारी भी बढ़े। जहाँ विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और खुशियाँ किसी की आर्थिक हैसियत की मोहताज न रहें। यही दीपावली का सच्चा संदेश है,अपने घर में दीप जलाइए,लेकिन अपने भीतर इतना प्रकाश भी जगाइए कि किसी दूसरे के घर का अंधेरा आपको दिखाई देने लगे।
शुभ दीपोंत्सव।
भवदीय
अमित राव पवार,,देवास (म.प्र.)
युवा लेखक-इतिहासविद


