
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। दीपावली की खरीदारी में अब चाइनीज उत्पादों के बजाय स्थानीय कारीगरों के हाथों से बने स्वदेशी सामान को प्राथमिकता मिल रही है। सरकार की वोकल फॉर लोकल मुहिम को माटीकला मेले में लगे महिला उद्यमियों के स्टॉल मजबूती दे रहे हैं। यहां मिट्टी के दीये और सजावटी सामान के साथ रसोई में इस्तेमाल होने वाले कुकर, तवा, चम्मच, प्लेट और सुराही तक उपलब्ध हैं।
आकर्षक डिजाइन, मजबूती और टिकाऊपन के चलते ये उत्पाद गृहणियों को पसंद आ रहे हैं। खास बात यह है कि स्थानीय महिलाएं पारंपरिक कला को आधुनिक जरूरतों से जोड़कर ऐसे उत्पाद तैयार कर रही हैं, जो चाइनीज बाजार के सामान का विकल्प बन रहे हैं। इससे दीपावली की खरीदारी के साथ स्थानीय कारोबार और महिला आत्मनिर्भरता को भी संबल मिल रहा है।

जत्तीवाड़ा निवासी रश्मि प्रजापति नौकरी के साथ पिता के माटीकला व्यवसाय में हाथ बंटाती हैं। नौकरी खत्म होने के बाद सीधे मेले में पहुंचकर उत्पादों की बिक्री करती हैं। वह बच्चों और उनके अभिभावकों को मिट्टी के बर्तन बनाने का प्रशिक्षण भी देती हैं, ताकि नई पीढ़ी पारंपरिक कला से जुड़ सके।
मेरठ निवासी नीना गुप्ता ने माटीकला का प्रशिक्षण लेकर अपने हुनर को कारोबार में बदला है। वह मिट्टी के आकर्षक और उपयोगी उत्पाद तैयार कर रही हैं। वहीं, गाजियाबाद की सीमा सागर ने माटीकला के उत्पादों के दम पर अपना सालाना कारोबार करीब 80 लाख रुपये तक पहुंचाया है। पल्लवी भी मिट्टी के बर्तनों के साथ आकर्षक डेकोरेटिव आइटम तैयार कर रही हैं। उनके उत्पादों में पारंपरिक कला और आधुनिक डिजाइन का मेल देखने को मिलता है।

कंकरखेड़ा निवासी इति सिक्का गाय के गोबर से दीपक और पूजा सामग्री तैयार कर रही हैं। उनका सालाना कारोबार करीब 50 लाख रुपये है। दीपावली पर उनके उत्पाद पर्यावरण अनुकूल विकल्प के रूप में ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं। कृत्रिम सजावटी सामान के बजाय प्राकृतिक संसाधनों से बने उत्पादों की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है। फाजलपुर निवासी राखी सिंह को कान्हा जी के कपड़े बनाने का शौक था। धीरे-धीरे यही शौक व्यवसाय बन गया। अब उनकी तैयार पोशाकों के साथ बच्चों के हाथ से बुने कपड़ों और सजावटी सामान की भी मांग है। वह अपनी रचनात्मकता से पारंपरिक हस्तकला को बाजार में नई पहचान दे रही हैं।

जिला ग्रामोद्योग अधिकारी मान्या चतुर्वेदी का कहना है कि माटीकला मेले में महिला उद्यमियों के स्टॉल वोकल फॉर लोकल की अवधारणा को जमीन पर उतार रहे हैं। दीपावली की खरीदारी में स्थानीय उत्पादों को मिल रही प्राथमिकता से छोटे कारोबारियों और कारीगरों को आर्थिक मजबूती मिल रही है। महिलाओं की रचनात्मकता अब घरेलू हुनर तक सीमित नहीं, बल्कि रोजगार और बड़े कारोबार का आधार बन रही है। स्वदेशी उत्पादों को अपनाने की यह पहल स्थानीय अर्थव्यवस्था और महिला आत्मनिर्भरता दोनों को नई दिशा दे रही है।


