नित्य संदेश। दीवाली आते ही बाजारों में रौनक बढ़ जाती है, घरों में सफाई शुरू हो जाती है और आसमान आतिशबाजी से जगमगा उठता है। लेकिन क्या दीवाली सिर्फ इतनी ही है? अगर हम ठहरकर सोचें, तो यह त्योहार हर साल हमें एक ही सवाल पूछता है — क्या हमने अपने भीतर का अंधेरा दूर किया?
राम के अयोध्या लौटने की कथा हम सब जानते हैं। चौदह साल के वनवास के बाद जब अयोध्या में दीप जले, तो वह सिर्फ एक राजा के स्वागत का उत्सव नहीं था, वह अन्याय पर न्याय की, अहंकार पर विनम्रता की और अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक था। आज भी दीवाली का असली अर्थ वही है।
आज की दीवाली थोड़ी बदल गई है। पहले दीपक मिट्टी के होते थे, अब लाइटें चीन से आती हैं। पहले मिठाई घर पर बनती थी, अब ऑनलाइन ऑर्डर होती है। पहले पड़ोसी के घर जाकर शुभकामनाएं दी जाती थीं, अब व्हाट्सऐप पर एक फॉरवर्डेड मैसेज भेज दिया जाता है। सुविधा बढ़ी है, लेकिन आत्मीयता कहीं पीछे छूट गई है।
सबसे बड़ा सवाल पर्यावरण का है। एक रात की आतिशबाजी के लिए हम पूरे साल की हवा खराब कर देते हैं। जिन दीपों से हमें रोशनी फैलानी थी, उन्हीं के धुएं में हमारे बच्चे सांस नहीं ले पाते। क्या यही लक्ष्मी का स्वागत है? धन की देवी उसी घर में बसती हैं, जहां स्वच्छता हो, शांति हो और सबके लिए जगह हो। पटाखों के शोर में न बुजुर्ग सो पाते हैं, न जानवर चैन से रह पाते हैं।
दीवाली का दूसरा अर्थ है — सफाई। हम घर तो साफ कर लेते हैं, लेकिन मन का कचरा? ईर्ष्या, लालच, गुस्सा, पुरानी रंजिशें — ये साल भर जमा होती रहती हैं। दीवाली हमें मौका देती है कि हम इन्हें भी बाहर निकाल फेंकें। किसी से मनमुटाव है तो जाकर गले मिल लें। किसी का कर्ज है तो चुका दें। किसी को माफ करना है तो कर दें। यही सच्ची लक्ष्मी पूजा है।
इस बार की दीवाली को थोड़ा अलग मनाकर देखिए।
एक दीपक अपने घर के लिए, एक दीपक उस पड़ोसी के लिए जो अकेला रहता है। एक मिठाई का डिब्बा अपने लिए, एक किसी जरूरतमंद बच्चे के लिए। पटाखों पर खर्च होने वाले पैसों से किसी गरीब की पढ़ाई में मदद कर दीजिए। यकीन मानिए, उस बच्चे की मुस्कान किसी भी रॉकेट से ज्यादा रोशन होगी।
व्यापारियों के लिए भी दीवाली सिर्फ मुनाफे का मौसम नहीं है। यह भरोसे का त्योहार है। ग्राहक को सही दाम पर सही चीज देना भी एक तरह की पूजा ही है।
दीवाली हमें याद दिलाती है कि अंधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटा सा दीपक उसे हरा सकता है। जरूरत है तो बस दीपक जलाने की हिम्मत की।
इस दीवाली, आइए हम सिर्फ घर नहीं, मन भी रोशन करें। सिर्फ बाहर नहीं, भीतर भी उजाला करें।
सपना सीपी साहू
समाचार संपादक


