
नित्य संदेश ब्यूरो
नई दिल्ली। रेडक्लिफ लैब्स के शोधकर्ताओं और सहयोगी संस्थानों द्वारा की गई एक रिसर्च प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल क्लिनिकल डिस्मॉर्फोलॉजी में प्रकाशित हुई है। इस रिसर्च में एक गर्भस्थ शिशु में TAPT1 जीन के एक नए वेरिएंट की पहचान की गई, जो नॉन-इम्यून हाइड्रॉप्स फीटेलिस (NIHF) और हड्डियों के असामान्य विकास से जुड़ा पाया गया। यह रिसर्च बताती है कि जब शुरुआती जांचों से किसी जटिल भ्रूण संबंधी स्थिति का स्पष्ट कारण सामने नहीं आता, तब उन्नत जेनेटिक जांच बीमारी से जुड़े संभावित आनुवंशिक कारणों की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
“Nonimmune hydrops fetalis with skeletal dysplasia due to a novel homozygous recessive TAPT1 splice-donor variant” शीर्षक से प्रकाशित इस रिसर्च में रेडक्लिफ लैब्स के मॉलिक्यूलर जेनेटिक्स विभाग की डॉ. हिमानी पांडे, डॉ. वरुण वेंकट, डॉ. शिवानी मिश्रा और सुश्री आयुषी गुप्ता सहित अन्य शोधकर्ताओं ने योगदान दिया है।
इस मामले में दूसरी तिमाही में गर्भवती एक 22 वर्षीय महिला को विस्तृत अल्ट्रासाउंड जांच के लिए भेजा गया था। जांच में गर्भस्थ शिशु के शरीर में व्यापक सूजन, फेफड़ों और हृदय के आसपास तरल पदार्थ जमा होने और पेट में भी असामान्य रूप से पानी भरने के संकेत मिले। इसके अलावा, शिशु के सिर का घेरा सामान्य से छोटा था, लंबी हड्डियों का विकास प्रभावित था और जांघ की हड्डियां (फीमर) मुड़ी हुई थीं। दोनों पैर अंदर और नीचे की ओर मुड़े हुए थे, जिसे क्लबफुट कहा जाता है। मस्तिष्क के पिछले हिस्से में ब्लेक्स पाउच सिस्ट भी पाया गया।
ये सभी लक्षण नॉन-इम्यून हाइड्रॉप्स फीटेलिस (NIHF) की ओर संकेत कर रहे थे। यह एक गंभीर स्थिति है, जिसमें गर्भस्थ शिशु के शरीर के कम से कम दो हिस्सों या गुहाओं में असामान्य रूप से तरल पदार्थ जमा हो जाता है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जिनमें आनुवंशिक बीमारियां भी शामिल हैं। हालांकि, कई मामलों में शुरुआती जांच के बावजूद बीमारी का सटीक कारण पता लगाना चुनौतीपूर्ण रहता है।
भारत में इस तरह की जटिल स्थितियों को समझने में जेनेटिक रिसर्च की भूमिका भी लगातार महत्वपूर्ण हो रही है। पश्चिमी राजस्थान में 2026 में किए गए एक अध्ययन में NIHF से प्रभावित 41 शिशुओं की जांच की गई। इनमें से 36.6% मामलों में होल एक्सोम सीक्वेंसिंग के जरिए बीमारी से जुड़े जेनेटिक बदलावों की पहचान हुई। ये आंकड़े उस अध्ययन में शामिल समूह तक सीमित हैं, लेकिन जटिल भ्रूण संबंधी स्थितियों में उन्नत जेनेटिक जांच की उपयोगिता को दर्शाते हैं।
इस मामले में सबसे पहले रेडक्लिफ लैब्स में क्रोमोसोमल माइक्रोएरे एनालिसिस (CMA) की गई। इस जांच में कोई स्पष्ट क्रोमोसोमल असामान्यता या कॉपी नंबर में बदलाव नहीं मिला। हालांकि, क्रोमोसोम 4 पर 31.14 Mb और क्रोमोसोम 10 पर 13.53 Mb के ऐसे लंबे क्षेत्र पाए गए, जहां दोनों क्रोमोसोमल प्रतियों में आनुवंशिक समानता थी। इन्हें लॉन्ग कंटिग्युअस स्ट्रेचेज ऑफ होमोजायगोसिटी (LCSH) कहा जाता है। जांच में ट्राइसोमी, मोनोसोमी या पॉलीप्लॉइडी के भी कोई संकेत नहीं मिले।
चूंकि CMA से शिशु की स्थिति का स्पष्ट आनुवंशिक कारण सामने नहीं आया, इसलिए आगे एमनियोटिक फ्लूइड के नमूने की होल एक्सोम सीक्वेंसिंग (WES) की गई। इस जांच में TAPT1 जीन में एक नया वेरिएंट c.1236+1G>A मिला, जिसे संभावित रूप से रोगकारी (Likely Pathogenic) माना गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, रिसर्च प्रकाशित होने के समय तक यह वेरिएंट ClinVar और gnomAD v4 जैसे प्रमुख जेनेटिक डेटाबेस में दर्ज नहीं था।
इसके बाद सेंगर सीक्वेंसिंग के जरिए मां के नमूने में इस वेरिएंट की पुष्टि हुई, जहां यह हेटेरोजायगस स्थिति में पाया गया। शिशु के एमनियोटिक फ्लूइड के नमूने में भी इसकी पुष्टि की गई। पिता का नमूना पुष्टि के लिए उपलब्ध नहीं था। कंप्यूटर आधारित विश्लेषण से संकेत मिला कि यह वेरिएंट RNA स्प्लाइसिंग की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इसके कारण एक्सॉन 11 छूट सकता है और TAPT1 प्रोटीन का सामान्य निर्माण बाधित हो सकता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, रिसर्च प्रकाशित होने तक मेडिकल साहित्य में TAPT1 से जुड़े ऐसे केवल 17 मामले दर्ज थे। उनकी जानकारी के अनुसार, भारत में TAPT1 से संबंधित ऑस्टियोकॉन्ड्रोडिस्प्लेसिया का यह केवल दूसरा प्रकाशित मामला है। यह रिसर्च इस दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से जुड़े नए वेरिएंट और उनके संभावित प्रभावों के बारे में उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी को बढ़ाती है।
TAPT1 जीन शरीर की उन कोशिकीय प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो हड्डियों और कार्टिलेज के सामान्य विकास के लिए जरूरी हैं। इस जीन में रोगकारी बदलाव ऑस्टियोकॉन्ड्रोडिस्प्लेसिया से जुड़े पाए गए हैं। यह हड्डियों और कार्टिलेज के विकास को प्रभावित करने वाली दुर्लभ बीमारियों का एक समूह है। इस मामले में मिला नया वेरिएंट शिशु में देखी गई असामान्यताओं के लिए एक संभावित आनुवंशिक और आणविक स्पष्टीकरण प्रस्तुत करता है।
यह मामला गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासाउंड और उन्नत जेनेटिक जांच को एक साथ इस्तेमाल करने के महत्व को भी सामने लाता है। अल्ट्रासाउंड शिशु के शारीरिक विकास में असामान्यताओं की पहचान कर सकता है, जबकि CMA क्रोमोसोम के स्तर पर होने वाले बदलावों का पता लगाने में मदद करता है। हालांकि, कुछ ऐसे जेनेटिक बदलाव होते हैं जिन्हें CMA से पहचानना संभव नहीं होता। ऐसे मामलों में, जब शिशु में कई असामान्यताएं हों और शुरुआती जांचों से स्पष्ट निदान न मिले, तब होल एक्सोम सीक्वेंसिंग संभावित आनुवंशिक कारणों की पहचान में मदद कर सकती है। इससे डॉक्टरों को बीमारी को बेहतर ढंग से समझने, जेनेटिक काउंसलिंग और भविष्य की गर्भावस्था से जुड़े फैसले लेने में सहायता मिल सकती है।
डॉ. हिमानी पांडे, लैब हेड – जीनोमिक्स, रेडक्लिफ लैब्स और रिसर्च की सह-लेखिका, ने कहा, “जटिल भ्रूण संबंधी स्थितियों में कई बार सामान्य जांचों से बीमारी का वास्तविक कारण सामने नहीं आ पाता। ऐसे मामलों में उन्नत जीनोमिक जांच उन आनुवंशिक बदलावों की पहचान करने में मदद करती है, जिन्हें पारंपरिक जांचों से पकड़ना संभव नहीं होता। इस रिसर्च में सामने आया TAPT1 वेरिएंट दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण योगदान है। इससे ऐसे मामलों में अधिक स्पष्ट निदान और बेहतर जेनेटिक काउंसलिंग की संभावनाएं भी मजबूत होती हैं।”
आदित्य कांडोई, संस्थापक एवं CEO, रेडक्लिफ लैब्स, ने कहा, “दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों के मामलों में बीमारी के वास्तविक कारण तक पहुंचना परिवारों और डॉक्टरों, दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में उन्नत डायग्नोस्टिक तकनीकों और क्लिनिकल रिसर्च में लगातार निवेश करना जरूरी है। हमारा प्रयास केवल जांच की सुविधाएं उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि रिसर्च के माध्यम से जटिल स्वास्थ्य स्थितियों को बेहतर ढंग से समझने और उनके निदान में योगदान देने का भी है। हम चाहते हैं कि आधुनिक जीनोमिक जांच की सुविधाएं अधिक से अधिक लोगों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों तक पहुंचें, ताकि बेहतर जानकारी के आधार पर स्वास्थ्य संबंधी फैसले लिए जा सकें।”
रेडक्लिफ लैब्स में उपलब्ध उन्नत जीनोमिक जांच सुविधाओं में क्रोमोसोमल माइक्रोएरे एनालिसिस, होल एक्सोम सीक्वेंसिंग, क्लिनिकल एक्सोम सीक्वेंसिंग, टार्गेटेड जेनेटिक टेस्टिंग और सेंगर सीक्वेंसिंग शामिल हैं। इन तकनीकों के जरिए दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों और जटिल क्लिनिकल मामलों की जांच में सहायता मिलती है।
क्लिनिकल डिस्मॉर्फोलॉजी में प्रकाशित यह रिसर्च दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों पर रेडक्लिफ लैब्स के क्लिनिकल रिसर्च प्रयासों को दर्शाती है। नए जेनेटिक वेरिएंट और उनके संभावित प्रभावों को सामने लाकर यह अध्ययन TAPT1 से जुड़ी बीमारियों की वैज्ञानिक समझ को आगे बढ़ाने में योगदान देता है।


